Word-Meaning: - [१] (अग्निः) = वे अग्रेणी प्रभु (त्वम्) = उस (जरतः कर्णम्) = [जरते to invoke, praise] स्तुति करनेवाले को जो सुनता है, अर्थात् जो अपने कानों में यथासम्भव स्तुति के शब्दों को ही आने देता है, उसको (आव) = रक्षित करता है। हम जब खाली हों प्रभु के स्तोत्रों का उच्चारण करने लगें तो इस प्रकार प्रभु की स्तुति के शब्द ही हमारे कानों में पड़ेंगे। तब ' भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः ' यह प्रार्थना हमारे जीवनों में अनूदित हो रही होगी और तब हम प्रभु से रक्षणीय होंगे। [२] (अग्निः) = वे प्रभु (अद्भ्यः) = शरीस्थ रेतः कणों के द्वारा (जरूथम्) = [speaking harohly ] क्रूरता से बोलनेवाले को (निरदहत्) = भस्म कर देता है। शरीर में इन रेतः कणों के रक्षण से कड़वा बोलने की वृत्ति ही नहीं रहती । असंयमी और अतएव क्षीण शक्ति पुरुषों के जीवनों में ही कड़वाहट आ जाती है। [३] (अग्निः) = वे प्रभु ही (घर्मे अन्तः) = इस वासनाओं की गर्मी से परिपूर्ण संसार में (अत्रिम्) = [अविद्यमानाः त्रयो यस्मिन्, अथवा अतति इति] काम-क्रोध-लोभ से ऊपर उठनेवाले निरन्तर क्रियाशील पुरुष को (उरुष्यत्) = रक्षित करता है । प्रभु ही इन वासनाओं का शिकार होने से हमें बचाते हैं। [४] (अग्निः) = वे प्रभु ही (नृमेधम्) = [नृ-मेध] मनुष्यों के साथ अपना सम्पर्क रखनेवाले को, केवल स्वार्थमय वैयक्तिक जीवन न बितानेवाले को (प्रजया) = उत्तम सन्तान से (सं असृजत्) = संसृष्ट करते हैं । वस्तुतः हम प्रभु की प्रजा का ध्यान करते हैं तो प्रभु हमारे सन्तानों को अच्छा बनाते हैं ।
Connotation: - भावार्थ - जरत्कर्ण बनकर हम प्रभु से रक्षणीय हों । संयम के द्वारा कर्कशता से ऊपर उठें। इस वासनामय जगत् में क्रियाशील बनकर उलझे नहीं, 'नृमेध' बनकर उत्तम सन्तानोंवाले हों ।