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अ॒ग्निर्ह॒ त्यं जर॑त॒: कर्ण॑मावा॒ग्निर॒द्भ्यो निर॑दह॒ज्जरू॑थम् । अ॒ग्निरत्रिं॑ घ॒र्म उ॑रुष्यद॒न्तर॒ग्निर्नृ॒मेधं॑ प्र॒जया॑सृज॒त्सम् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

agnir ha tyaṁ jarataḥ karṇam āvāgnir adbhyo nir adahaj jarūtham | agnir atriṁ gharma uruṣyad antar agnir nṛmedham prajayāsṛjat sam ||

पद पाठ

अ॒ग्निः । ह॒ । त्यम् । जर॑तः । कर्ण॑म् । आ॒व॒ । अ॒ग्निः । अ॒त्ऽभ्यः । निः । अ॒द॒ह॒त् । जरू॑थम् । अ॒ग्निः । अत्रि॑म् । घ॒र्मे । उ॒रु॒ष्य॒त् । अ॒न्तः । अ॒ग्निः । नृ॒ऽमेध॑म् । प्र॒ऽजया॑ । अ॒सृ॒ज॒त् । सम् ॥ १०.८०.३

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:80» मन्त्र:3 | अष्टक:8» अध्याय:3» वर्ग:15» मन्त्र:3 | मण्डल:10» अनुवाक:6» मन्त्र:3


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (अग्निः) अग्रणेता परमात्मा (ह) निश्चय (जरतः) स्तुति करते हुए उपासक के (त्यं कर्णम्) उस स्तुति सुनते हुए कान की (आव) रक्षा करता है-अपनी स्तुति में स्थिर करता है (अग्निः) परमात्मा (जरूथम्) स्तुति करनेवाले को (अद्भ्यः) अमृत प्राणों के लिए, ‘अमृत प्राणों की प्राप्ति के लिए’ (निर्-अदहत्) देता है अथवा भौतिक अग्नि की भान्ति नहीं जलाता है (अग्निः) परमात्मा (अत्रिम्) स्तुति करनेवाले की वाणी को (धर्मे) अध्यात्मयज्ञ में (उरुष्यत्) रक्षित करता है (अग्निः) परमात्मा (नृमेधम्) प्रजा के संकल्प करनेवाले को (प्रजया) प्रजा से सन्तान से (सम्-असृजत्) संयुक्त करता है ॥३॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा अपनी स्तुति करनेवाले के स्तुति सुनते हुए कान की रक्षा करता है और उस की वाणी को सुरक्षित रखता है, संसार में उसे सन्तानवाला मोक्ष में अमृत प्राण प्रदान करता है ॥३॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

प्रभु की रक्षा का पात्र

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (अग्निः) = वे अग्रेणी प्रभु (त्वम्) = उस (जरतः कर्णम्) = [जरते to invoke, praise] स्तुति करनेवाले को जो सुनता है, अर्थात् जो अपने कानों में यथासम्भव स्तुति के शब्दों को ही आने देता है, उसको (आव) = रक्षित करता है। हम जब खाली हों प्रभु के स्तोत्रों का उच्चारण करने लगें तो इस प्रकार प्रभु की स्तुति के शब्द ही हमारे कानों में पड़ेंगे। तब ' भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः ' यह प्रार्थना हमारे जीवनों में अनूदित हो रही होगी और तब हम प्रभु से रक्षणीय होंगे। [२] (अग्निः) = वे प्रभु (अद्भ्यः) = शरीस्थ रेतः कणों के द्वारा (जरूथम्) = [speaking harohly ] क्रूरता से बोलनेवाले को (निरदहत्) = भस्म कर देता है। शरीर में इन रेतः कणों के रक्षण से कड़वा बोलने की वृत्ति ही नहीं रहती । असंयमी और अतएव क्षीण शक्ति पुरुषों के जीवनों में ही कड़वाहट आ जाती है। [३] (अग्निः) = वे प्रभु ही (घर्मे अन्तः) = इस वासनाओं की गर्मी से परिपूर्ण संसार में (अत्रिम्) = [अविद्यमानाः त्रयो यस्मिन्, अथवा अतति इति] काम-क्रोध-लोभ से ऊपर उठनेवाले निरन्तर क्रियाशील पुरुष को (उरुष्यत्) = रक्षित करता है । प्रभु ही इन वासनाओं का शिकार होने से हमें बचाते हैं। [४] (अग्निः) = वे प्रभु ही (नृमेधम्) = [नृ-मेध] मनुष्यों के साथ अपना सम्पर्क रखनेवाले को, केवल स्वार्थमय वैयक्तिक जीवन न बितानेवाले को (प्रजया) = उत्तम सन्तान से (सं असृजत्) = संसृष्ट करते हैं । वस्तुतः हम प्रभु की प्रजा का ध्यान करते हैं तो प्रभु हमारे सन्तानों को अच्छा बनाते हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - जरत्कर्ण बनकर हम प्रभु से रक्षणीय हों । संयम के द्वारा कर्कशता से ऊपर उठें। इस वासनामय जगत् में क्रियाशील बनकर उलझे नहीं, 'नृमेध' बनकर उत्तम सन्तानोंवाले हों ।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (अग्निः) अग्रणेता परमात्मा (ह) निश्चयेन (जरतः) स्तुवतः स्तुतिं कुर्वतः-उपासकस्य (त्यं कर्णम्) तं कर्णं स्तुतिशृण्वन्तं (आव) अवति रक्षति स्वस्तुतौ स्थापयति (अग्निः) परमात्मा (जरूथम्) गरूथं स्तोतारं (अद्भ्यः) अमृतेभ्यः प्राणेभ्यः “प्राणा वा आपः” [तै० ३।२।२] “अमृतो ह्यापः” [श० ३।९।४।१६] (निर्-अदहत्) निरयच्छत् प्रयच्छति ददाति “दह धातुरत्र दानार्थे” “मातिधक्-मास्मानतिहाय-दाः” [निरु० १।७] भौतिकाग्निरिव न दहति “निर् उपसर्गो निषेधे निराकरणे वर्तते” “निर् निषेधे” [अव्ययार्थनिबन्धनम्] यथा निःशुल्कः, निष्कामः “तस्यापि निरोधे सर्वनिरोधान्निर्बीजः समाधिः” [योग० १।५१] अपितु तद्विपरीतम् “अद्भ्यो जलेभ्यः समर्पयति” (अग्निः) परमात्मा (अत्रिं धर्मे-उरुष्यत्) जरतः स्तुवतो वाचम् “वागत्रिः” [श० १४।५।२।२] यज्ञे ‘धर्मो यज्ञनाम” [निघ० ३।१७] रक्षति “उरुष्यति रक्षाकर्मा” [निरु० ५।२३] पुनः (अग्निः) परमात्मा (नृमेधं प्रजया सम्-असृजत) नृषु प्रजासु “प्रजा वै नरः” [ऐ० २।४] मेधा सङ्कल्पः कामो यस्य स नृमेधस्तं प्रजाकामं प्रजया पुत्रादिकया सह संयुक्तं करोति ॥३॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Agni protects the devotee’s health of sense and mind and establishes him in piety and prayer. Agni burns away the debilitating impurities from waters and from the blood stream of the body system. Agni protects the enlightened man free from triple bonds of infatuation with family, fame and finance. Agni establishes the man dedicated to yajnic advancement of humanity in the right relationship with family, friends and community.