Word-Meaning: - [१] (स) = यह (मातुः) = इस पृथ्वी माता की (गुह्यम्) = गुहा में स्थित कन्द आदि पदार्थों को (प्रतरम्) = प्रकृष्टतया (इच्छन्) = चाहता हुआ (कुमारः न) = सब कुत्सित प्रवृत्तियों को मारते हुए के समान (उर्वी: वीरुधः) = इन फैलनेवाले पौधों की ओर (सर्पत्) = गति करता है, इन पर लगनेवाले शाक फलों को भोज्य पदार्थों के रूप में स्वीकार करता है। [२] सबसे उत्कृष्ट भोज्य पदार्थ तो पृथ्वी माता के गर्भ में उत्पन्न होनेवाले कन्द हैं जो कि मुनियों के मुख्य भोजन बनते हैं। इन के सेवन से राजस व तामस प्रवृत्तियाँ उत्पन्न ही नहीं होती। इनके बाद इन पौधों पर होनेवाले शाकों का क्रम आता है। ये भी हमारी शक्तियों का विस्तार करनेवाले होते हैं। [२] (न) = जैसे यह 'सौचीक अग्नि' (पक्वम्) = पके हुए अतएव (शुचन्तम्) = चमकते हुए (ससम्) = यव आदि सस्यों को (अविदत्) = प्राप्त करता है, उसी प्रकार (रिपः) = पृथिवी की (उपस्थे अन्तः) = गोद के अन्दर (रिरिह्वांसम्) = मूलों से,जड़ों से रस का आस्वादन लेते हुए इन वृक्षों को [अविदत्] प्राप्त करता है । इन वृक्षों के फलों को यह स्वीकार करता है। यहाँ पृथ्वी को 'रिप्' कहा है, इसकी गोद को विदीर्ण करके वृक्ष बाहर आ जाते हैं [rip = रिप्] आकाश में इनकी शाखाएँ शयन करती हैं एवं इनका मूल माता के उत्संग में होता है, शिखर द्युलोक रूप पिता की गोद में। एक प्रभु-भक्त इन वृक्षों के फलों का सेवन करता है और उनके अन्दर प्रभु की रचना के महत्त्व को देखता है।
Connotation: - भावार्थ - प्रभु-भक्तों के भोजन 'कन्द, शाक, फल व अन्न' ही होते हैं ।