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प्र मा॒तुः प्र॑त॒रं गुह्य॑मि॒च्छन्कु॑मा॒रो न वी॒रुध॑: सर्पदु॒र्वीः । स॒सं न प॒क्वम॑विदच्छु॒चन्तं॑ रिरि॒ह्वांसं॑ रि॒प उ॒पस्थे॑ अ॒न्तः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

pra mātuḥ prataraṁ guhyam icchan kumāro na vīrudhaḥ sarpad urvīḥ | sasaṁ na pakvam avidac chucantaṁ ririhvāṁsaṁ ripa upasthe antaḥ ||

पद पाठ

प्र । मा॒तुः । प्र॒ऽत॒रम् । गुह्य॑म् । इ॒च्छन् । कु॒मा॒रः । न । वी॒रुधः॑ । स॒र्प॒त् । उ॒र्वीः । स॒मम् । न । प॒क्वम् । अ॒वि॒द॒त् । शु॒चन्त॑म् । रि॒रि॒ह्वांस॑म् । रि॒पः । उ॒पऽस्थे॑ । अ॒न्तरिति॑ ॥ १०.७९.३

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:79» मन्त्र:3 | अष्टक:8» अध्याय:3» वर्ग:14» मन्त्र:3 | मण्डल:10» अनुवाक:6» मन्त्र:3


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (मातुः) उस माता परमात्मा के (प्रतरम्) प्रकृष्टतर-अत्युत्तम (गुह्यम्) गुप्त मोक्ष धाम को (इच्छन्) चाहता हुआ उपासक आत्मा (कुमारः-न) बालक के समान (उर्वीः-वीरुधः) बहुविध रचनविशेष से कार्य-कारण द्रव्यों की विरोहण करने योग्य भूमियों को (प्रसर्पत्) प्राप्त होता है (पक्वं शुचन्तम्) पके हुए शुभ्र (ससं न) अन्न की भाँति कर्मफल को (रिरिह्वांसम्) आस्वादन करते हुए को (रिपः-उपस्थे अन्ते) शरीरस्थान के अन्तर्गत (अविदत्) प्राप्त होता है ॥३॥
भावार्थभाषाः - उपासक आत्मा माता परमात्मा के आनन्दधाम मोक्ष का आस्वादन करने के लिए ऐसे प्राप्त होता है, जैसे कोई बालक कर्मानुसार युवति माता के आश्रय में सुखों को प्राप्त करता है ॥३॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

कन्द- शाक- अन्न फल

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (स) = यह (मातुः) = इस पृथ्वी माता की (गुह्यम्) = गुहा में स्थित कन्द आदि पदार्थों को (प्रतरम्) = प्रकृष्टतया (इच्छन्) = चाहता हुआ (कुमारः न) = सब कुत्सित प्रवृत्तियों को मारते हुए के समान (उर्वी: वीरुधः) = इन फैलनेवाले पौधों की ओर (सर्पत्) = गति करता है, इन पर लगनेवाले शाक फलों को भोज्य पदार्थों के रूप में स्वीकार करता है। [२] सबसे उत्कृष्ट भोज्य पदार्थ तो पृथ्वी माता के गर्भ में उत्पन्न होनेवाले कन्द हैं जो कि मुनियों के मुख्य भोजन बनते हैं। इन के सेवन से राजस व तामस प्रवृत्तियाँ उत्पन्न ही नहीं होती। इनके बाद इन पौधों पर होनेवाले शाकों का क्रम आता है। ये भी हमारी शक्तियों का विस्तार करनेवाले होते हैं। [२] (न) = जैसे यह 'सौचीक अग्नि' (पक्वम्) = पके हुए अतएव (शुचन्तम्) = चमकते हुए (ससम्) = यव आदि सस्यों को (अविदत्) = प्राप्त करता है, उसी प्रकार (रिपः) = पृथिवी की (उपस्थे अन्तः) = गोद के अन्दर (रिरिह्वांसम्) = मूलों से,जड़ों से रस का आस्वादन लेते हुए इन वृक्षों को [अविदत्] प्राप्त करता है । इन वृक्षों के फलों को यह स्वीकार करता है। यहाँ पृथ्वी को 'रिप्' कहा है, इसकी गोद को विदीर्ण करके वृक्ष बाहर आ जाते हैं [rip = रिप्] आकाश में इनकी शाखाएँ शयन करती हैं एवं इनका मूल माता के उत्संग में होता है, शिखर द्युलोक रूप पिता की गोद में। एक प्रभु-भक्त इन वृक्षों के फलों का सेवन करता है और उनके अन्दर प्रभु की रचना के महत्त्व को देखता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु-भक्तों के भोजन 'कन्द, शाक, फल व अन्न' ही होते हैं ।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (मातुः प्रतरं गुह्यम्-इच्छन्) तस्य परमात्मनो मातृभूतस्य प्रकृष्टतरं गुप्तं मोक्षधाम वाञ्छन्-उपासक आत्मा (कुमारः-न उर्वीः-वीरुधः-प्रसर्पत्) बाल इव बहुविधानि रचनाविशेषेण कार्यकारणद्रव्याणां विरोहणी योग्यभूमिः “वीरुत्सु सत्तारचनाविशेशेषु निरुद्धेषु कार्यकारणद्रव्येषु” [ऋ० १।६७।५ दयानन्दः] प्राप्नोति (पक्वं शुचन्तं ससं न) पक्वं शुभमन्नमिव कर्मफलम् (रिरिह्वांसं रिपः-उपस्थे-अन्तः) आस्वादयन्तं पृथिव्याः-उपस्थे-शरीरस्थाने-अन्तर्गते प्राप्नोति ॥३॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Loving and seeking the ultimate mystery of Agni, mother spirit of life and human evolution, the seeker comes like an innocent child moving up silently by and along the various folds of earthly existence, ultimately reaching the centre core of the mystery and attains the radiant presence deliciously ecstatic like the ripest fruit of life.