Word-Meaning: - [१] (एते) = ये (नरः) = प्रगतिशील मनुष्य (स्वपसः) = उत्तम कर्मोंवाले अभूतन होते हैं, (ये) = जो (अद्रयः) = प्रभु के उपासक इन्द्राय प्रभु की प्राप्ति के लिये (सोमं सुनुथ) = सोम का अभिषव करते हैं। ' अपने अन्दर सोम को उत्पन्न करना, उसे शरीर में सुरक्षित करना' यह हमें, [क] उत्तम कर्मोंवाला बनाता है, अशुभ कर्मों में हमारी प्रवृत्ति ही नहीं रहती । [ख] हम प्रभु प्रवण बनते हैं, प्रभु के उपासक होते हैं, [ग] और अन्ततः प्रभु को प्राप्त करनेवाले होते हैं । [२] (दिव्याय धाम्ने) = दिव्य तेज [divine power] की प्राप्ति के लिये (वः) = तुम्हारा (वामं वामम्) = प्रत्येक कार्य बड़ा सुन्दर हो । (वः) = तुम्हारे में से (सुन्वते) = सोमाभिषव करनेवाले, सोम का सम्पादन करनेवाले, (पार्थिवाय) = इस शरीररूप पृथिवी के अधिपति के लिए (वसुवसु) = निवास के लिये प्रत्येक आवश्यक तत्त्व प्राप्त हो। सदा शुभ कर्मों में प्रवृत्त रहने से दिव्य तेज की प्राप्ति होती है, और शरीर में सोम का सम्पादन करते हुए शरीर का अधिपति बनने से सब वसुओं का हम अधिष्ठान बनते हैं।
Connotation: - भावार्थ-सोम का रक्षण करनेवाले पुरुष उत्तम कर्मों में प्रवृत्त होते हैं, ये प्रभु के उपासक बनते हैं और दिव्य तेज को प्राप्त करते हैं। गत सूक्त की तरह यह सूक्त भी सोम-रक्षण के महत्त्व को बतला रहा है। इस सोम का रक्षण करता हुआ यह अब उन ज्ञान की रश्मियों को प्राप्त करता है जो उसके सुख व आनन्द का कारण बनती हैं, (स्यूम = heppiness, रश्मि = rey of light) इससे इसका नाम 'स्यूमरश्मि' हो जाता है । यह भार्गव है, भृगुपुत्र है, अत्यन्त तपस्वी है । तपस्वी बने बिना 'स्यूमरश्मि' बनने का सम्भव भी तो नहीं। यह स्यूमरश्मि सोमरक्षण के उद्देश्य से प्राणसाधना में प्रवृत्त होता है और प्राणों [= मरुतों] की स्तुति करता हुआ कहता है-