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ए॒ते न॑र॒: स्वप॑सो अभूतन॒ य इन्द्रा॑य सुनु॒थ सोम॑मद्रयः । वा॒मंवा॑मं वो दि॒व्याय॒ धाम्ने॒ वसु॑वसु व॒: पार्थि॑वाय सुन्व॒ते ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ete naraḥ svapaso abhūtana ya indrāya sunutha somam adrayaḥ | vāmaṁ-vāmaṁ vo divyāya dhāmne vasu-vasu vaḥ pārthivāya sunvate ||

पद पाठ

ए॒ते । न॒रः॒ । सु॒ऽअप॑सः । अ॒भू॒त॒न॒ । ये । इन्द्रा॑य । सु॒नु॒थ । सोम॑म् । अ॒द्र॒यः॒ । वा॒मम्ऽवा॑मम् । वः॒ । दि॒व्याय॑ । धाम्ने॑ । वसु॑ऽवसु । वः॒ । पार्थि॑वाय । सु॒न्व॒ते ॥ १०.७६.८

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:76» मन्त्र:8 | अष्टक:8» अध्याय:3» वर्ग:9» मन्त्र:3 | मण्डल:10» अनुवाक:6» मन्त्र:8


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (एते) ये (अद्रयः) मन्त्रवचन पढ़नेवाले (नरः) जीवन्मुक्त (स्वपसः) शोभन कर्मवाले (अभूतन) तुम हो (ये) जो (इन्द्राय परमात्मा के लिए (सोमम्) उपासनारस को (सुनुथ) सम्पादित करते हो (वः) तुम्हारा (वामं वामम्) श्रेष्ठ श्रेष्ठ स्तुति वचन (दिव्याय धाम्ने) मोक्षधाम के लिए मोक्षप्राप्ति के लिए है (वसु वसु) प्रत्येक सामान्य धन (पार्थिवाय) पार्थिव शरीर के लिए (सुन्वते) सुखसम्पादन के लिए तुम समर्थ हो ॥८॥
भावार्थभाषाः - जीवन्मुक्त महानुभावों के प्रवचन मोक्षानन्द के लिए तथा सांसारिक सुख के लिए भी होते हैं, उन का सत्सङ्ग करना आवश्यक है ॥८॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

दिव्य तेज

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (एते) = ये (नरः) = प्रगतिशील मनुष्य (स्वपसः) = उत्तम कर्मोंवाले अभूतन होते हैं, (ये) = जो (अद्रयः) = प्रभु के उपासक इन्द्राय प्रभु की प्राप्ति के लिये (सोमं सुनुथ) = सोम का अभिषव करते हैं। ' अपने अन्दर सोम को उत्पन्न करना, उसे शरीर में सुरक्षित करना' यह हमें, [क] उत्तम कर्मोंवाला बनाता है, अशुभ कर्मों में हमारी प्रवृत्ति ही नहीं रहती । [ख] हम प्रभु प्रवण बनते हैं, प्रभु के उपासक होते हैं, [ग] और अन्ततः प्रभु को प्राप्त करनेवाले होते हैं । [२] (दिव्याय धाम्ने) = दिव्य तेज [divine power] की प्राप्ति के लिये (वः) = तुम्हारा (वामं वामम्) = प्रत्येक कार्य बड़ा सुन्दर हो । (वः) = तुम्हारे में से (सुन्वते) = सोमाभिषव करनेवाले, सोम का सम्पादन करनेवाले, (पार्थिवाय) = इस शरीररूप पृथिवी के अधिपति के लिए (वसुवसु) = निवास के लिये प्रत्येक आवश्यक तत्त्व प्राप्त हो। सदा शुभ कर्मों में प्रवृत्त रहने से दिव्य तेज की प्राप्ति होती है, और शरीर में सोम का सम्पादन करते हुए शरीर का अधिपति बनने से सब वसुओं का हम अधिष्ठान बनते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ-सोम का रक्षण करनेवाले पुरुष उत्तम कर्मों में प्रवृत्त होते हैं, ये प्रभु के उपासक बनते हैं और दिव्य तेज को प्राप्त करते हैं। गत सूक्त की तरह यह सूक्त भी सोम-रक्षण के महत्त्व को बतला रहा है। इस सोम का रक्षण करता हुआ यह अब उन ज्ञान की रश्मियों को प्राप्त करता है जो उसके सुख व आनन्द का कारण बनती हैं, (स्यूम = heppiness, रश्मि = rey of light) इससे इसका नाम 'स्यूमरश्मि' हो जाता है । यह भार्गव है, भृगुपुत्र है, अत्यन्त तपस्वी है । तपस्वी बने बिना 'स्यूमरश्मि' बनने का सम्भव भी तो नहीं। यह स्यूमरश्मि सोमरक्षण के उद्देश्य से प्राणसाधना में प्रवृत्त होता है और प्राणों [= मरुतों] की स्तुति करता हुआ कहता है-
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (एते-अद्रयः-नरः) एते ये मन्त्रवचनपाठका जीवन्मुक्ताः (स्वपसः) शोभनकर्माणो यूयं (अभूतन) भवथ (मे-इन्द्राय सोमं सुनुथ) मह्यं परमात्मने खलूपासनारसं सम्पादयथ (वः-वामं वामं दिव्याय धाम्ने) युष्माकं श्रेष्ठं श्रेष्ठं स्तुतिवचनं दिव्यधाम्ने मोक्षाय मोक्षप्राप्तये भवति (वसु वसु पार्थिवाय सुन्वते) सामान्यं धनं धनं प्रत्येकं धनं पार्थिवशरीराय सुखसम्पादनाय यूयं समर्थाः स्थ ॥८॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O enlightened sages, such you are, people of holy action, yajakas and creators of soma, to offer your homage of living joy to Indra, lord of glory. All the beauties and graces of life you create, all the wealth, honour and excellence of earthly life you achieve is for the service of Indra, your homage in totality to Divinity, Spirit of the earth.