Word-Meaning: - [१] (तत्) = वह (हि) = निश्चय से (अस्य) = इस सोम का (सवनम्) = उत्पादन (अपः) = कर्मों को (विवेः) = व्याप्त करता है। शरीर में सोम के रक्षण से मनुष्य का जीवन क्रियाशील बनता है । यह सोम (मनवे) = विचारशील पुरुष के लिये (यथा) = ठीक-ठीक [जैसे चाहिए उस प्रकार ] (पुरा) = [पृ पालन पूरणयोः] पालन व पूरण के दृष्टिकोण से (गातुम्) = मार्ग का (अश्रेत्) = सेवन करता है । सोम के रक्षण के होने पर मनुष्य गलत मार्ग पर नहीं जाता, ठीक मार्ग पर चलने से उसका पालन व पोषण उचित प्रकार से होता है। [२] ये सोम का सवन व रक्षण करनेवाले लोग (गो अर्णसि) = वेदवाणी से प्राप्य ज्ञानजलों (त्वाष्ट्रे) = [त्वटुः इदम्] निर्माण सम्बन्धी कार्यों के निमित्त तथा (अश्वनिर्णिजि) = इन्द्रियों के शोधन के निमित्त [णिजिर् शौचपोषणयोः], (ईम्) = और निश्चय से (अध्वरेषु) = हिंसारहित यज्ञात्मक कर्मों के निमित्त (अध्वरान्) = हिंसा व कुटिलता से रहित कर्मों को (प्र अशिश्रयुः) = प्रकर्षेण सेवन करते हैं। सोम के रक्षण के ये परिणाम हैं- [क] ज्ञान प्राप्ति, [ख] निर्माणात्मक कार्यों में रुचि, [ग] इन्द्रियों की शुचिता, [घ] यज्ञशीलता ।
Connotation: - भावार्थ- सोमरक्षण हमें क्रियाशील बनाता है और मार्ग से भ्रष्ट होने से बचाता है ।