Word-Meaning: - [१] हे (दक्ष) = संसार का वर्धन करनेवाले प्रभो ! (हि) = निश्चय से यह (अदिति:) = अविनाशी प्रकृति, (या) = जो कि (तव) = आपकी (दुहिता) = प्रपूरक है [दुह प्रपूरणे], वह (अजनिष्ट) = इस संसार को जन्म देती है। एक कुशल कुम्हार घड़े बनाने में जैसे किसी अन्य चेतन की सहायता की अपेक्षा न करके स्वयं ही मट्टी से घड़े बनाता है, उसी प्रकार वे सर्वशक्तिमान् सर्वज्ञ प्रभु भी इस अदिति से इस ब्रह्माण्ड के सब लोक-लोकान्तरों का निर्माण करते हैं। लोक-लोकान्तरों का उपादानकारण तो यह प्रकृति ही है, यही विकृत होकर इस चराचर के रूप में आती है। परमात्मा ही विकृत होकर इन लोकों का रूप नहीं धारण कर लेते, प्रभु तो निर्विकार हैं, वे उपादानकारण नहीं है । प्रभु तो इस सृष्टि के निमित्तकारण ही हैं। वे अपने इस कार्य में किसी की सहायता की अपेक्षा नहीं करते, इसी से वे सर्वशक्तिमान् हैं । [२] (तां अनु) = सत्त्व, रजस्, तमो गुणात्मिका इस अदिति के अनुसार ही (देवा:) = इस ब्रह्माण्ड के सब देव, सब लोक-लोकान्तर, सूर्य, चन्द्र, नक्षत्र आदि भी (अजायन्त) = सत्त्व, रजस् व तमस् को लेकर ही उत्पन्न हुए हैं। ये सब लोक व दिव्य पिण्ड (भद्रा:) = हमारा कल्याण व सुख करनेवाले हैं और (अमृतबन्धवः) = [ अ + मृत+बन्धु] हमारे साथ नीरोगता का सम्बन्ध करनेवाले हैं। जितना-जितना हम इन सूर्यादि देवों के सम्पर्क में जीवन बितायेंगे उतना-उतना ही दीर्घजीवी बनेंगे। पशु हमारी अपेक्षा अधिक प्राकृतिक जीवन बिताते हैं और परिणामतः नीरोग होते हैं। यह प्रकृति हमें भी नीरोग बनाती है यदि हम इसकी गोद में बैठने का ध्यान करते हैं ।
Connotation: - भावार्थ - प्रभु प्रकृति के द्वारा इस संसार को बनाते हैं, सब पिण्ड प्रकृति के अनुसार सत्त्व, रजस् व तमस् को लिये हुए हैं। कोई भी पदार्थ इन गुणों से रहित नहीं, ये हमें सुखी व नीरोग बनाते हैं ।