अफला अपुष्पा वेदवाणी - बांझ गौ
Word-Meaning: - [१] गत मन्त्र के अनुसार जिसके प्रति वेदवाणी रूप पत्नी अपने रूप को प्रकट करती है (त्वं उत)= उसको ही (सख्ये) = मिलकर के होनेवाली ज्ञानचर्चाओं के प्रसंग में [सह चक्षते अस्मिन्] (स्थिरपीतम्) = स्थिरता से किये हुए ज्ञान के पानवाला (आहुः) = करते हैं। (एनम्) = इस स्थिरपीत व्यक्ति को (वाजिनेषु) = [वाक् इना येषां ] वाक् से ज्ञेय अर्थों में (न हिन्वन्ति अपि) = नहीं ही प्राप्त होते । यह जितनी सुन्दर वाग् शेष अर्थों का प्रतिपादन करता है, उतना अन्य लोग नहीं कर पाते, शास्त्रार्थ में इससे जीत नहीं पाते। एवं वेदवाणी के अर्थ का 'मनन, निदिध्यासन व साक्षात्कार' भी अत्यन्त आवश्यक है । [२] मननादि को न करके श्रवण तक ही अपने को सीमित करनेवाला (एषः) = यह व्यक्ति (वाचं शुश्रुवान्) = वाणी का सुननेवाला तो हुवा है, परन्तु (अफलां अपुष्पाम्) = इसने फल पुष्प रहित ही वाणी को सुना है। वाणी के पुष्प व फल उसके अर्थ ही है । अर्थ को नहीं जाना तो वह वाणी अफलता अपुष्पा तो हो ही गई। 'यज्ञविषयक ज्ञान' इस वाणी का पुष्प है और 'देवता [प्रभु] विषयक ज्ञान' इसका फल है। जिसने वेदवाणी को सुनकर यज्ञों व देवों को नहीं जाना, यज्ञ में प्रवृत्त नहीं हुआ तथा प्रभु के उपासन में नहीं लगा तो उसके लिये यह वेदवाणी 'अफला व अपुष्पा' ही रही। [३] वह वेदवाणी के अर्थ को न समझनेवाला पुरुष तो (अधेन्वा) = एक अप्रशस्त धेनु के साथ (मायया) = माया व भ्रान्ति को पैदा करता हुआ (चरति) = विचरण करता है । जैसे बांझ और शरीर में हृष्ट-पुष्ट गौ को लिये हुए एक पुरुष इधर-उधर घूमता है तो लोगों को यही भ्रम होता है कि मनभर तो दूध देती ही होगी, इसी प्रकार इस वेदोच्चारण करनेवाले पुरुष के लिये लोगों के हृदय में उसके लिये महती भ्रान्ति उत्पन्न हो जाती है, वे उसे बड़ा वेदज्ञ समझने लगते हैं, जब कि वास्तव में वह कोरे का कोरा ही है ।
Connotation: - भावार्थ-वेदार्थ को समझनेवाला ही वेद से कल्याण को प्राप्त करता है। दूसरे के लिये तो यह वेदवाणी वन्ध्या गौ के ही समान है।