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उ॒त त्वं॑ स॒ख्ये स्थि॒रपी॑तमाहु॒र्नैनं॑ हिन्व॒न्त्यपि॒ वाजि॑नेषु । अधे॑न्वा चरति मा॒ययै॒ष वाचं॑ शुश्रु॒वाँ अ॑फ॒लाम॑पु॒ष्पाम् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

uta tvaṁ sakhye sthirapītam āhur nainaṁ hinvanty api vājineṣu | adhenvā carati māyayaiṣa vācaṁ śuśruvām̐ aphalām apuṣpām ||

पद पाठ

उ॒त । त्व॒म् । स॒ख्ये । स्थि॒रऽपी॑तम् । आहुः॑ । न । ए॒न॒म् । हि॒न्व॒न्ति॒ । अपि॑ । वाजि॑नेषु । अधे॑न्वा । च॒र॒ति॒ । मा॒यया॑ । ए॒षः । वाच॑म् । शु॒श्रु॒ऽवान् । अ॒फ॒लाम् । आ॒पु॒ष्पाम् ॥ १०.७१.५

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ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:71» मन्त्र:5 | अष्टक:8» अध्याय:2» वर्ग:23» मन्त्र:5 | मण्डल:10» अनुवाक:6» मन्त्र:5


ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (उत त्वं सख्ये) किसी एक अर्थ जाननेवाले-वाणी के साथ ज्ञान से समानता को प्राप्त कर लेने पर या विद्वानों के साथ मित्रता प्राप्त कर लेने पर (स्थिरपीतम्-आहुः) स्वात्मा में धारण किया हुआ कहते हैं (वाजिनेषु) वाणी के स्वामी विद्वानों में या वाणी के ज्ञानप्रसङ्गों में (एनं-न-अपि हिन्वन्ति) इसे कोई भी नहीं प्राप्त करते (अधेन्वा मायया-एष चरति) वाणी के प्रतिरूप वाणी जैसी के साथ विचरता है, उसे ऐसे (वाचम्-अफलाम्-अपुष्पां शुश्रुवान्) जो वाणी को पुष्पफलरहित अर्थात् अर्थशून्य सुनता है ॥५॥
भावार्थभाषाः - जो वाणी के साथ अर्थज्ञान से मित्रता बनाता है अथवा विद्वानों से वाणी के अर्थों को जानता है, उसे वाणी के लाभ को प्राप्त हुआ कहते हैं और जो वाणी के अर्थ को नहीं जानता, वह केवल शब्दरूप बोलता है। वह वाणी के प्रतिरूपक काष्ठ की गौ के समान व्यवहार करता है ॥५॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

अफला अपुष्पा वेदवाणी - बांझ गौ

पदार्थान्वयभाषाः - [१] गत मन्त्र के अनुसार जिसके प्रति वेदवाणी रूप पत्नी अपने रूप को प्रकट करती है (त्वं उत)= उसको ही (सख्ये) = मिलकर के होनेवाली ज्ञानचर्चाओं के प्रसंग में [सह चक्षते अस्मिन्] (स्थिरपीतम्) = स्थिरता से किये हुए ज्ञान के पानवाला (आहुः) = करते हैं। (एनम्) = इस स्थिरपीत व्यक्ति को (वाजिनेषु) = [वाक् इना येषां ] वाक् से ज्ञेय अर्थों में (न हिन्वन्ति अपि) = नहीं ही प्राप्त होते । यह जितनी सुन्दर वाग् शेष अर्थों का प्रतिपादन करता है, उतना अन्य लोग नहीं कर पाते, शास्त्रार्थ में इससे जीत नहीं पाते। एवं वेदवाणी के अर्थ का 'मनन, निदिध्यासन व साक्षात्कार' भी अत्यन्त आवश्यक है । [२] मननादि को न करके श्रवण तक ही अपने को सीमित करनेवाला (एषः) = यह व्यक्ति (वाचं शुश्रुवान्) = वाणी का सुननेवाला तो हुवा है, परन्तु (अफलां अपुष्पाम्) = इसने फल पुष्प रहित ही वाणी को सुना है। वाणी के पुष्प व फल उसके अर्थ ही है । अर्थ को नहीं जाना तो वह वाणी अफलता अपुष्पा तो हो ही गई। 'यज्ञविषयक ज्ञान' इस वाणी का पुष्प है और 'देवता [प्रभु] विषयक ज्ञान' इसका फल है। जिसने वेदवाणी को सुनकर यज्ञों व देवों को नहीं जाना, यज्ञ में प्रवृत्त नहीं हुआ तथा प्रभु के उपासन में नहीं लगा तो उसके लिये यह वेदवाणी 'अफला व अपुष्पा' ही रही। [३] वह वेदवाणी के अर्थ को न समझनेवाला पुरुष तो (अधेन्वा) = एक अप्रशस्त धेनु के साथ (मायया) = माया व भ्रान्ति को पैदा करता हुआ (चरति) = विचरण करता है । जैसे बांझ और शरीर में हृष्ट-पुष्ट गौ को लिये हुए एक पुरुष इधर-उधर घूमता है तो लोगों को यही भ्रम होता है कि मनभर तो दूध देती ही होगी, इसी प्रकार इस वेदोच्चारण करनेवाले पुरुष के लिये लोगों के हृदय में उसके लिये महती भ्रान्ति उत्पन्न हो जाती है, वे उसे बड़ा वेदज्ञ समझने लगते हैं, जब कि वास्तव में वह कोरे का कोरा ही है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ-वेदार्थ को समझनेवाला ही वेद से कल्याण को प्राप्त करता है। दूसरे के लिये तो यह वेदवाणी वन्ध्या गौ के ही समान है।

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (उत त्वं सख्ये) अप्येकमर्थज्ञं वाक्सख्ये-वाचा सह ज्ञानेन-ताद्भाव्यं प्राप्ते देवसख्ये वा (स्थिरपीतम्-आहुः) स्थिरं स्वात्मनि धारितं कथयन्ति (वाजिनेषु-एनं न-अपि हिन्वन्ति) वाज्-इनेषु मन्त्रवाचो ये इनाः स्वामिनो देवास्तेषु यद्वा वाग्ज्ञेयेषु प्रसङ्गेषु केऽपि न प्राप्नुवन्ति (अधेन्वा मायया-एष चरति) वाक्प्रतिरूपया धेनुरूपयेव चरति विचरति पठति (वाचम्-अफलाम्-अपुष्पां शुश्रुवान्) यो वाचं पुष्पफलरहितामर्थशून्यां श्रुतवान् ॥५॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Such a realised soul, they say, is a sober scholar on solid foundations in matters of language, meaning and vision of reality. In scholarly meets they do not trifle with him, nor contradict him. But some may not even come to the fringe of his attainment. And another one moves around like a barren cow, struck by the magic of mere sound of words, hearing language without fruit or flower.