सुमित्र का स्तुत्यतर कार्य
Word-Meaning: - [१] हे (अग्ने) = अग्रेणी प्रभो ! (सुमित्रः) = यह पापों व रोगों से अपने को अच्छी तरह बचानेवाला पुरुष (यत्) = जो (ते) = तेरा (मनुः) = मनन करनेवाला बनता है और (यत्) = जो, इस मनन के द्वारा (अनीकम्) = बल को व रश्मिसंघ को (समीधे) = अपने में दीप्त करता है (तद् इदम्) = यह प्रभु के मनन के द्वारा अपने में बल व प्रकाश को दीप्त करना (नवीयः) = अत्यन्त प्रशंसनीय कर्म है। प्रभु का मनन करनेवाला प्रभु के बल व प्रकाश से युक्त होता ही है । [२] प्रभु इस सुमित्र से कहते हैं कि [क] (स) = वह तू (रेवत् शोच) = धनयुक्त होकर दीप्त होनेवाला हो । जीवनयात्रा के लिये आवश्यक धन की तुझे कमी न हो और तू दीप्त जीवनवाला बने । [ख] (स) = वह तू (गिरः जुषस्व) = वेदवाणियों का सेवन करनेवाला बन वेदवाणियाँ तेरे ज्ञान को निरन्तर बढ़ायें तथा इनके द्वारा तू प्रभु का स्तवन करनेवाला बने। [ग] (स) = वह तू (वाजम्) = शत्रु के बल का (दर्षि) = विदारण कर, काम-क्रोधादि शत्रुओं के बल को जीतनेवाला हो । [घ] (स) = वह तू (इह) = यहाँ इस जीवन में (श्रवः) = यश को (धाः) = धारण कर । बड़ा मर्यादित जीवन बिताता हुआ तू यशस्वी जीवनवाला हो ।
Connotation: - भावार्थ- 'सुमित्र' प्रभु का मनन करता है, प्रभु के तेज से तेजस्वी बनता है । धनयुक्त दीप्त जीवनवाला, वेदवाणियों का मनन करनेवाला, कामादि शत्रुओं के बल का विदारण करनेवाला व यशस्वी होता है ।