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यत्ते॒ मनु॒र्यदनी॑कं सुमि॒त्रः स॑मी॒धे अ॑ग्ने॒ तदि॒दं नवी॑यः । स रे॒वच्छो॑च॒ स गिरो॑ जुषस्व॒ स वाजं॑ दर्षि॒ स इ॒ह श्रवो॑ धाः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yat te manur yad anīkaṁ sumitraḥ samīdhe agne tad idaṁ navīyaḥ | sa revac choca sa giro juṣasva sa vājaṁ darṣi sa iha śravo dhāḥ ||

पद पाठ

यत् । ते॒ । मनुः॑ । यत् । अनी॑कम् । सु॒ऽमि॒त्रः । स॒म्ऽई॒धे । अ॒ग्ने॒ । तत् । इ॒दम् । नवी॑यः । सः । रे॒वत् । शो॒च॒ । सः । गिरः॑ । जु॒ष॒स्व॒ । सः । वाज॑म् । द॒र्षि॒ । सः । इ॒ह । श्रवः॑ । धाः॒ ॥ १०.६९.३

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ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:69» मन्त्र:3 | अष्टक:8» अध्याय:2» वर्ग:19» मन्त्र:3 | मण्डल:10» अनुवाक:6» मन्त्र:3


ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (अग्ने) हे अग्रणायक ! (ते) तेरा (यत्-अनीकम्) जो सेनाबल है (मनुः-सुमित्रः) मननशील अच्छा मित्र सहयोगी (समीधे) सम्यक् दीप्त करता है-प्रोत्साहित करता है (तत्-इदं नवीयः) उस सैन्यबल को बहुत प्रशंसनीय तू (रेवत् शोच) ऐश्वर्यवाला प्रसिद्ध कर (सः) वह तू (गिरः-जुषस्व) प्रेरणावचनों को सेवन कर (सः) वह तू (वाजं दर्षि) शत्रुबल को क्षीण कर (सः) वह तू (श्रवः-धाः) यश अथवा अन्न को धारण कर ॥३॥
भावार्थभाषाः - जिस राजा के पास सैन्यबल प्रबल होता है और वह उस सैन्यबल को बढ़ाता है, प्रोत्साहित करता है, तो वह उसका साथ देनेवाले मित्र के समान हो जाता है, शत्रु को विदीर्ण करता है, उसके यश को बढ़ाता है ॥३॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

सुमित्र का स्तुत्यतर कार्य

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (अग्ने) = अग्रेणी प्रभो ! (सुमित्रः) = यह पापों व रोगों से अपने को अच्छी तरह बचानेवाला पुरुष (यत्) = जो (ते) = तेरा (मनुः) = मनन करनेवाला बनता है और (यत्) = जो, इस मनन के द्वारा (अनीकम्) = बल को व रश्मिसंघ को (समीधे) = अपने में दीप्त करता है (तद् इदम्) = यह प्रभु के मनन के द्वारा अपने में बल व प्रकाश को दीप्त करना (नवीयः) = अत्यन्त प्रशंसनीय कर्म है। प्रभु का मनन करनेवाला प्रभु के बल व प्रकाश से युक्त होता ही है । [२] प्रभु इस सुमित्र से कहते हैं कि [क] (स) = वह तू (रेवत् शोच) = धनयुक्त होकर दीप्त होनेवाला हो । जीवनयात्रा के लिये आवश्यक धन की तुझे कमी न हो और तू दीप्त जीवनवाला बने । [ख] (स) = वह तू (गिरः जुषस्व) = वेदवाणियों का सेवन करनेवाला बन वेदवाणियाँ तेरे ज्ञान को निरन्तर बढ़ायें तथा इनके द्वारा तू प्रभु का स्तवन करनेवाला बने। [ग] (स) = वह तू (वाजम्) = शत्रु के बल का (दर्षि) = विदारण कर, काम-क्रोधादि शत्रुओं के बल को जीतनेवाला हो । [घ] (स) = वह तू (इह) = यहाँ इस जीवन में (श्रवः) = यश को (धाः) = धारण कर । बड़ा मर्यादित जीवन बिताता हुआ तू यशस्वी जीवनवाला हो ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- 'सुमित्र' प्रभु का मनन करता है, प्रभु के तेज से तेजस्वी बनता है । धनयुक्त दीप्त जीवनवाला, वेदवाणियों का मनन करनेवाला, कामादि शत्रुओं के बल का विदारण करनेवाला व यशस्वी होता है ।

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (अग्ने) हे अग्रणायक ! (ते) तव (यत्-अनीकम्) यत्खलु सैन्यं सेनाबलम् “अनीकं सैन्यम्”  [ऋ० १।१२१।४] (मनुः सुमित्रः) मननशीलः शोभनो मित्रः सहयोगी (समीधे) सन्दीपयति सम्यग् दीपयति प्रोत्साहयति ‘पुरुषव्यत्ययः’ (तत्-इदं नवीयः-सः) तत्सैन्यं बहुस्तुत्यं प्रशंसनीयं स त्वं (रेवत्-शोच) धनवत् प्रज्ज्वलितं प्रसिद्धं कुरु (सः) स त्वं (गिरः-जुषस्व) प्रेरणावचनानि सेवस्व (सः) स त्वं (वाजं दर्षि) शत्रुबलं क्षीणं कुरु (सः) स त्वं (अवः-धाः) यशोऽन्नं वा धारय ॥३॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O prime and pioneering power, Agni, the bright and blazing light and flame of yours which Manu, thoughtful intellectual and noble friend, kindles with positive intention and purpose is new and it is adorable. Let it shine rich in wealth. Listen and respond to our words and voices of hope and prayer. Destroy negative forces. Create and bring us honour and prosperity here and now.