Word-Meaning: - [१] इन्द्रियों, मन व बुद्धि में असुर अपनी नगरियाँ बना लेते हैं, अर्थात् इन्द्रियाँ काम से, मन क्रोध से व बुद्धि लोभ से आक्रान्त हो जाती है। ये नगरियाँ यहाँ 'अपाची' कहलायी हैं 'अप् अञ्च्'=बाहर की ओर ले जानेवाली अथवा प्रभु से दूर ले जानेवाली । आसुर वृत्तियों के कारण हम संसार के विषयों में फँस जाते हैं और प्रभु को भूल जाते हैं । यदि हम इन्द्रियों को शान्त कर पाते हैं तो इन आसुर-पुरियों के विदारण में भी समर्थ हो जाते हैं। (शयथा) = [शी=tranguility= शान्ति] = शान्ति के द्वारा अथवा हृदय में शयन व निवास के द्वारा (अपाचीम्) = प्रभु से हमें दूर ले जाने वाली (पुरम्) = इस वासनात्मक असुर पुरी का (ईं विभिद्या) = निश्चय से विदारण करके, यह विदारण करनेवाला पुरुष (उदधेः साकम्) = [ कामो हि समुद्रः ] अनन्त विषयरूप जलवाले काम के साथ (त्रीणि) = 'काम-क्रोध-लोभ' इन तीनों को (निः अकृन्तत्) = निश्चय से काट डालता है । सामान्यतः पुरुष 'काम-क्रोध-लोभ' में ही भटकता रहता है, और प्रभु को भूल जाता है । हृदय में ध्यान करने से अथवा वृत्ति को शान्त बनाने के द्वारा हम 'काम-क्रोध-लोभ' को जीत लेते हैं और प्रभु प्रवण वृत्तिवाले बनते हैं । [२] यह (बृहस्पतिः) = शान्त वृत्तिवाला और अतएव ज्ञानी पुरुष (उषसम्) = उषा को (सूर्यम्) = सूर्य को (गाम्) = गौ को (अर्कम्) = अर्क को (विवेद) = विशेष रूप से प्राप्त करता है । 'उषस्' शब्द 'उष दाहे' धातु से बनकर दोष- दहन का प्रतीक है, 'सूर्य' 'सृ गतौ' से बनकर निरन्तर गति व क्रियाशीलता का संकेत करता है, गौ शब्द 'गमयति अर्थम्' इस व्युत्पति से अर्थों का ज्ञान देनेवाली वाणी का वाचक है, 'अकर्म' शब्द 'अर्च' धातु से बनकर पूजा का प्रतिपादक है। बृहस्पति के जीवन में ये चारों चीजें बड़ी सुन्दरता से उपस्थित होती हैं। यह दोषों का दहन करनेवाला होता है, निरन्तर क्रियाशील बनता है, वेदवाणी के अध्ययन से ज्ञान को बढ़ाता है और प्रभु के पूजन की वृत्तिवाला होता है। [३] ऐसा बनकर यह स्तनयन् इव द्यौ:-गर्जना करते हुए द्युलोक के समान होता है। द्युलोकस्थ सूर्य की तरह सर्वत्र प्रकाश को फैलाता है, परन्तु गर्जते हुए मेघों के कारण जैसे सूर्य सन्तापकारी नहीं होता उसी प्रकार यह बृहस्पति भी गर्जते हुए मेघ के समान ज्ञान जल का वर्षण करता है और लोगों के सन्ताप को हरनेवाला ही बनता है। यह ज्ञान के प्रसार को बड़े माधुर्य से करता है ।
Connotation: - भावार्थ - असुर- पुरियों का विदारण करके हम प्रभु-प्रवण वृत्तिवाले बनें । ज्ञान प्रसार के कार्य को अहिंसा व माधुर्य के साथ करनेवाला हों।