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वि॒भिद्या॒ पुरं॑ श॒यथे॒मपा॑चीं॒ निस्त्रीणि॑ सा॒कमु॑द॒धेर॑कृन्तत् । बृह॒स्पति॑रु॒षसं॒ सूर्यं॒ गाम॒र्कं वि॑वेद स्त॒नय॑न्निव॒ द्यौः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

vibhidyā puraṁ śayathem apācīṁ nis trīṇi sākam udadher akṛntat | bṛhaspatir uṣasaṁ sūryaṁ gām arkaṁ viveda stanayann iva dyauḥ ||

पद पाठ

वि॒ऽभिद्य॑ । पुर॑म् । श॒यथा॑ । ई॒म् । अपा॑चीम् । निः । त्रीणि॑ । सा॒कम् । उ॒द॒ऽधेः । अ॒कृ॒न्त॒त् । बृह॒स्पतिः॑ । उ॒षस॑म् । सूर्य॑म् । गाम् । अ॒र्कम् । वि॒वे॒द॒ । स्त॒नय॑न्ऽइव । द्यौः ॥ १०.६७.५

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:67» मन्त्र:5 | अष्टक:8» अध्याय:2» वर्ग:15» मन्त्र:5 | मण्डल:10» अनुवाक:5» मन्त्र:5


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (बृहस्पतिः) वाणी का पालक और विस्तारक वक्ता (शयथा) अपने शरीर में प्राप्त होता हुआ (अपाचीं पुरं विभिद्य) निकृष्ट वासना को छिन्न-भिन्न करके (उदधेः) संसार सागर के (त्रीणि) तीन स्थूल सूक्ष्म कारण शरीरबन्धनों को (साकं निर्-अकृन्तत्) एक साथ छिन्न-भिन्न करता है (द्यौः स्तनयन्-इव) जैसे बिजली गरजती हुई मेघों को छिन्न-भिन्न करती है, ऐसे (उषसं सूर्यं गाम्-अर्कं विवेद) कमनीय बन्धनरहित स्तुतिवाणी को तथा अर्चनीय परमात्मा को प्राप्त करता है ॥५॥
भावार्थभाषाः - वेद का यथार्थज्ञाता और वक्ता इसी शरीर में रहता हुआ अपनी सारी वासनाओं को छिन्न-भिन्न कर देता है। अनन्तर स्थूल सूक्ष्म कारण शरीर के बन्धनों से छूटकर परमात्मा की उच्च स्तुति और उसके आश्रय में रमण करता है ॥५॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

उदधेः साकम् त्रीणि

पदार्थान्वयभाषाः - [१] इन्द्रियों, मन व बुद्धि में असुर अपनी नगरियाँ बना लेते हैं, अर्थात् इन्द्रियाँ काम से, मन क्रोध से व बुद्धि लोभ से आक्रान्त हो जाती है। ये नगरियाँ यहाँ 'अपाची' कहलायी हैं 'अप् अञ्च्'=बाहर की ओर ले जानेवाली अथवा प्रभु से दूर ले जानेवाली । आसुर वृत्तियों के कारण हम संसार के विषयों में फँस जाते हैं और प्रभु को भूल जाते हैं । यदि हम इन्द्रियों को शान्त कर पाते हैं तो इन आसुर-पुरियों के विदारण में भी समर्थ हो जाते हैं। (शयथा) = [शी=tranguility= शान्ति] = शान्ति के द्वारा अथवा हृदय में शयन व निवास के द्वारा (अपाचीम्) = प्रभु से हमें दूर ले जाने वाली (पुरम्) = इस वासनात्मक असुर पुरी का (ईं विभिद्या) = निश्चय से विदारण करके, यह विदारण करनेवाला पुरुष (उदधेः साकम्) = [ कामो हि समुद्रः ] अनन्त विषयरूप जलवाले काम के साथ (त्रीणि) = 'काम-क्रोध-लोभ' इन तीनों को (निः अकृन्तत्) = निश्चय से काट डालता है । सामान्यतः पुरुष 'काम-क्रोध-लोभ' में ही भटकता रहता है, और प्रभु को भूल जाता है । हृदय में ध्यान करने से अथवा वृत्ति को शान्त बनाने के द्वारा हम 'काम-क्रोध-लोभ' को जीत लेते हैं और प्रभु प्रवण वृत्तिवाले बनते हैं । [२] यह (बृहस्पतिः) = शान्त वृत्तिवाला और अतएव ज्ञानी पुरुष (उषसम्) = उषा को (सूर्यम्) = सूर्य को (गाम्) = गौ को (अर्कम्) = अर्क को (विवेद) = विशेष रूप से प्राप्त करता है । 'उषस्' शब्द 'उष दाहे' धातु से बनकर दोष- दहन का प्रतीक है, 'सूर्य' 'सृ गतौ' से बनकर निरन्तर गति व क्रियाशीलता का संकेत करता है, गौ शब्द 'गमयति अर्थम्' इस व्युत्पति से अर्थों का ज्ञान देनेवाली वाणी का वाचक है, 'अकर्म' शब्द 'अर्च' धातु से बनकर पूजा का प्रतिपादक है। बृहस्पति के जीवन में ये चारों चीजें बड़ी सुन्दरता से उपस्थित होती हैं। यह दोषों का दहन करनेवाला होता है, निरन्तर क्रियाशील बनता है, वेदवाणी के अध्ययन से ज्ञान को बढ़ाता है और प्रभु के पूजन की वृत्तिवाला होता है। [३] ऐसा बनकर यह स्तनयन् इव द्यौ:-गर्जना करते हुए द्युलोक के समान होता है। द्युलोकस्थ सूर्य की तरह सर्वत्र प्रकाश को फैलाता है, परन्तु गर्जते हुए मेघों के कारण जैसे सूर्य सन्तापकारी नहीं होता उसी प्रकार यह बृहस्पति भी गर्जते हुए मेघ के समान ज्ञान जल का वर्षण करता है और लोगों के सन्ताप को हरनेवाला ही बनता है। यह ज्ञान के प्रसार को बड़े माधुर्य से करता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - असुर- पुरियों का विदारण करके हम प्रभु-प्रवण वृत्तिवाले बनें । ज्ञान प्रसार के कार्य को अहिंसा व माधुर्य के साथ करनेवाला हों।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (बृहस्पतिः) वाचः पालको विस्तारयिता वक्ता (शयथा) स्वशयनरूपशरीरे प्राप्तः सन् (अपाचीं पुरं विभिद्य) निकृष्टां पुरं वासनां छित्त्वा (उदधेः) संसारसागरस्य (त्रीणि) त्रीणि बन्धनानि स्थूलसूक्ष्मकारणशरीराणि (साकं निर्-अकृन्तत्) सकृत् निश्छिनत्ति (द्यौः स्तनयन्-इव) यथा विद्युत् “द्यौः-विद्युत्” [ऋ० १।११३।२० दयानन्दः] स्तनयित्नुः शब्दं कुर्वन् मेघान् पातयति छिनत्ति (उषसं सूर्यं गाम्-अर्कं विवेद) कमनीयां बन्धनरहितां स्थितिं स्तुतिवाचम् “गौः-वाङ्नाम” [निघ० १।११] अर्चनीयं परमात्मानं जानाति ॥५॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Brhaspati, the seeker of light, in the state of turiya beyond deep sleep, breaks through the three bonds of the city of darkness of the mutable world like thunder and lightning breaking the dark cloud and directly realises the dawn, the sun rays, the sun and the light beyond the sun.