असुरस्य वीराः [प्रभु के पुत्र]
Word-Meaning: - [१] गत मन्त्र की समाप्ति पर समाधिजन्य तुरीयावस्था का संकेत है। इस स्थिति की ओर चलनेवाले लोग (ऋतं शंसन्तः) = ऋतका ही सदा शंसन करते हैं, इनके जीवन से अनृत का उच्चारण नहीं होता। (ऋजु दीध्यानाः) = ये सदा सरलता से कल्याण का ही ध्यान करनेवाले होते हैं, ये कभी किसी के अमंगल का विचार नहीं करते। (दिवः) = ज्ञान के द्वारा ये (पुत्रासः) = [पुंनाति त्रायते] अपने जीवन को पवित्र बनाते हैं और आधि-व्याधियों के आक्रमण से अपना रक्षण करते हैं । (असुरस्य वीराः) = ये उस [ असून् राति] प्राणशक्ति के देनेवाले प्रभु के वीर सन्तान बनते हैं, प्रभु से शक्ति को प्राप्त करके सब बुराइयों को विनष्ट करनेवाले होते हैं । [२] (अंगिरसः) = अंग-प्रत्यंग में रसवाले ये वीर पुरुष (विप्रं पदम्) = विशेषरूप से अपना पूरण करनेवाले [वि+प्रा] सर्वोच्च स्थान को (दधानाः) = धारण करने के हेतु से (यज्ञस्य) = उस यज्ञरूप प्रभु के (प्रथमं धाम) = सर्वोत्कृष्ट तेज का (मनन्त) = मनन करते हैं। इस प्रभु के तेज को अपना लक्ष्य बना करके ये भी अपने जीवन को यज्ञमय बनाते हैं और उन्नति को प्राप्त करते हुए 'विप्र पद' को धारण करनेवाले बनते हैं ।
Connotation: - भावार्थ - ऋत का शंसन करते हुए, प्रभु के तेज का स्मरण करते हुए हम उन्नत होते चलें । शूद्र से वैश्य, वैश्य से क्षत्रिय व क्षत्रिय से विप्र बननेवाले हों ।