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ऋ॒तं शंस॑न्त ऋ॒जु दीध्या॑ना दि॒वस्पु॒त्रासो॒ असु॑रस्य वी॒राः । विप्रं॑ प॒दमङ्गि॑रसो॒ दधा॑ना य॒ज्ञस्य॒ धाम॑ प्रथ॒मं म॑नन्त ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ṛtaṁ śaṁsanta ṛju dīdhyānā divas putrāso asurasya vīrāḥ | vipram padam aṅgiraso dadhānā yajñasya dhāma prathamam mananta ||

पद पाठ

ऋ॒तम् । शंस॑न्तः । ऋ॒जु । दीध्या॑नाः । दि॒वः । पु॒त्रासः॑ । असु॑रस्य । वी॒राः । विप्र॑म् । प॒दम् । अङ्गि॑रसः । दधा॑नाः । य॒ज्ञस्य॑ । धाम॑ । प्र॒थ॒मम् । म॒न॒न्त॒ ॥ १०.६७.२

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:67» मन्त्र:2 | अष्टक:8» अध्याय:2» वर्ग:15» मन्त्र:2 | मण्डल:10» अनुवाक:5» मन्त्र:2


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (ऋतं शंसन्तः) वेदज्ञान का उपदेश करते हुए (ऋजुदीध्यानाः) सरल स्वभाववाले परमात्मा का ध्यान करते हुए (दिवः-पुत्रासः) ज्ञानप्रकाशक परमात्मा के पुत्रसमान परमऋषि (असुरस्य वीराः) प्राणप्रद परमेश्वर के ज्ञानी (अङ्गिरसः) अङ्गों के स्वाधीन प्रेरित करनेवाले संयमी (विप्रं प्रदं दधानाः) विशेषरूप से तृप्त करनेवाले प्रापणीय परमात्मा को धारण करते हुए उपासक (यज्ञस्य प्रथमं धामं मनन्त) सङ्गमनीय परमात्मा के प्रमुख धाम-स्वरूप को मानते हैं ॥२॥
भावार्थभाषाः - आदि सृष्टि में परम ऋषि वेदज्ञान का उपदेश करते हैं, वे परमात्मा के ध्यान में मग्न हुए परमात्मा के पुत्रसमान, अपनी इन्द्रियों के स्वामी-संयमी होते हैं। वे परमात्मा के स्वरूप को यथार्थरूप से जानते हैं, वैसे ही दूसरों को भी जनाते हैं ॥२॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

असुरस्य वीराः [प्रभु के पुत्र]

पदार्थान्वयभाषाः - [१] गत मन्त्र की समाप्ति पर समाधिजन्य तुरीयावस्था का संकेत है। इस स्थिति की ओर चलनेवाले लोग (ऋतं शंसन्तः) = ऋतका ही सदा शंसन करते हैं, इनके जीवन से अनृत का उच्चारण नहीं होता। (ऋजु दीध्यानाः) = ये सदा सरलता से कल्याण का ही ध्यान करनेवाले होते हैं, ये कभी किसी के अमंगल का विचार नहीं करते। (दिवः) = ज्ञान के द्वारा ये (पुत्रासः) = [पुंनाति त्रायते] अपने जीवन को पवित्र बनाते हैं और आधि-व्याधियों के आक्रमण से अपना रक्षण करते हैं । (असुरस्य वीराः) = ये उस [ असून् राति] प्राणशक्ति के देनेवाले प्रभु के वीर सन्तान बनते हैं, प्रभु से शक्ति को प्राप्त करके सब बुराइयों को विनष्ट करनेवाले होते हैं । [२] (अंगिरसः) = अंग-प्रत्यंग में रसवाले ये वीर पुरुष (विप्रं पदम्) = विशेषरूप से अपना पूरण करनेवाले [वि+प्रा] सर्वोच्च स्थान को (दधानाः) = धारण करने के हेतु से (यज्ञस्य) = उस यज्ञरूप प्रभु के (प्रथमं धाम) = सर्वोत्कृष्ट तेज का (मनन्त) = मनन करते हैं। इस प्रभु के तेज को अपना लक्ष्य बना करके ये भी अपने जीवन को यज्ञमय बनाते हैं और उन्नति को प्राप्त करते हुए 'विप्र पद' को धारण करनेवाले बनते हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - ऋत का शंसन करते हुए, प्रभु के तेज का स्मरण करते हुए हम उन्नत होते चलें । शूद्र से वैश्य, वैश्य से क्षत्रिय व क्षत्रिय से विप्र बननेवाले हों ।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (ऋतं शंसन्तः) वेदज्ञानं प्रशंसन्तः उपदिशन्तः (ऋजुदीध्यानाः) सरलस्वभावं ब्रह्म ध्यायन्तः (दिवः-पुत्रासः) ज्ञानप्रकाशकस्य परमात्मनः पुत्रा इव परमर्षयः (असुरस्य वीराः) प्राणप्रदस्य परमात्मनो ज्ञानिनः (अङ्गिरसः) अङ्गानामीरयितारः संयमिनः (विप्रं पदं दधानाः) विशेषेण प्रीणयितारं प्रापणीयं परमात्मानं धारयन्तः-उपासकाः (यज्ञस्य प्रथमं धाम मनन्त) यजनीयस्य सङ्गमनीयस्य परमात्मनः प्रमुखं धाम स्वरूपं मन्यन्ते ॥२॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Speaking the Word of eternal knowledge, meditating on the natural, eternal spirit of omniscience, the Rshis, children of light, brave offsprings of divine virility, self-disciplined souls established in the position of vibrant sages among humanity, realise in direct experience the first and original presence of the adorable lord Supreme.