Word-Meaning: - [१] गत मन्त्र के अनुसार वेदवाणी को अपनानेवाले लोग (दिवक्षसः) = ज्ञान के प्रकाश में निवास करनेवाले होते हैं । (अग्निजिह्वाः) = अग्नि के समान प्रभावशालिनी जिह्वावाले होते हैं । इनके मुख से उच्चरित शब्द अपवित्रता व मलिनता को दग्ध करनेवाले होते हैं । (ऋतावृधः) = ये अपने जीवन में ऋत का वर्धन करनेवाले होते हैं । (ऋत) = यज्ञ का वर्धन तो ये करते ही हैं, साथ ही इनका जीवन बिलकुल ऋतवाला होता है, इनकी प्रत्येक क्रिया ठीक समय पर की जाती है । [२] ये देव (ऋतस्य योनिम्) = सब यज्ञों व सत्यों के उत्पत्ति स्थान प्रभु को [ऋतं च सत्यञ्चाभीद्धात्तपसो- ऽध्यजायत] (विमृशन्तः) = विचारते हुए (आसते) = आसीन होते हैं । ये प्रभु का चिन्तन करते हैं, प्रभु का चिन्तन 'ऋत के उत्पत्ति स्थान' के रूप में करते हैं । इस प्रकार चिन्तन करते हुए ये अपने जीवन को ऋतमय बनाने का प्रयत्न करते हैं। [३] ऋतमय जीवनवाले ये देव (द्यां स्कभित्वी) = मस्तिष्क रूप द्युलोक को धारण करके, अर्थात् अपने ज्ञान को उत्तम बनाकर (ओजसा) = ओजस्विता के साथ (अपः आचक्रुः) = अपने कर्त्तव्य कर्मों को करते हैं। इनके कर्म ज्ञानपूर्वक होते हैं, ज्ञानपूर्वक होने से ही इनके कर्म पवित्र होते हैं। इनके कर्म यज्ञात्मक बन जाते हैं । [४] (यज्ञं जनित्वी) = यज्ञों को जन्म देकर ये तन्वि शरीर में (निमामृजुः) = निश्चय से शोधन करनेवाले होते हैं। यज्ञात्मक कर्मों से इनका सारा जीवन ही पवित्र हो जाता है। इन कर्मों के होने पर शरीर में रोग नहीं आते, मन में राग-द्वेष का मैल नहीं होता और बुद्धि में कुण्ठता नहीं आ जाती। शरीर-मन-बुद्धि में पूर्ण शोधनवाले ये सचमुच देव होते हैं ।
Connotation: - भावार्थ- देव सदा प्रकाश में निवास करते हैं, इनके शब्द प्रभावशाली होते हैं, जीवन यज्ञमय होता है। यज्ञोपदेष्टा प्रभु का ये चिन्तन करते हैं। मस्तिष्क को ज्ञानपूर्ण करके ये शक्तिशाली कर्मों को करते हैं । यज्ञों के द्वारा जीवन को शुद्ध बनाते हैं।