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दि॒वक्ष॑सो अग्निजि॒ह्वा ऋ॑ता॒वृध॑ ऋ॒तस्य॒ योनिं॑ विमृ॒शन्त॑ आसते । द्यां स्क॑भि॒त्व्य१॒॑प आ च॑क्रु॒रोज॑सा य॒ज्ञं ज॑नि॒त्वी त॒न्वी॒३॒॑ नि मा॑मृजुः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

divakṣaso agnijihvā ṛtāvṛdha ṛtasya yoniṁ vimṛśanta āsate | dyāṁ skabhitvy apa ā cakrur ojasā yajñaṁ janitvī tanvī ni māmṛjuḥ ||

पद पाठ

दि॒वक्ष॑सः । अ॒ग्नि॒ऽजि॒ह्वाः । ऋ॒त॒ऽवृधः॑ । ऋ॒तस्य॑ । योनि॑म् । वि॒ऽमृ॒शन्तः॑ । आ॒स॒ते॒ । द्याम् । स्क॒भि॒त्वी । अ॒पः । आ । च॒क्रुः॒ । ओज॑सा । य॒ज्ञम् । ज॒नि॒त्वी । त॒न्वि॑ । नि । म॒मृजुः ॥ १०.६५.७

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:65» मन्त्र:7 | अष्टक:8» अध्याय:2» वर्ग:10» मन्त्र:2 | मण्डल:10» अनुवाक:5» मन्त्र:7


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (दिवक्षसः) ज्ञानप्रकाश प्राप्त हुए (अग्निजिह्वाः) अग्नि की भाँति विद्या का प्रकाश करनेवाली वाणी जिनकी है, ऐसे वक्ता जन (ऋतावृधः) सत्य के वर्धक (ऋतस्य योनिं विमृशन्तः-आसते) सत्य के मूल परमात्मा को विचार करते हुए जो विद्यमान हैं, (द्यां स्कभित्वी) ज्ञानप्रकाश को सम्भालकर-धारण करके (अपः-चक्रुः) कर्म करते हैं (ओजसा यज्ञं जनित्वा) स्वात्मबल से अध्यात्मयज्ञ को प्रसिद्ध करके (तन्वि निममृजुः) अपने आत्मा को शुद्ध करते हैं-अलङ्कृत करते हैं ॥७॥
भावार्थभाषाः - जो ज्ञान में परिपक्व और वक्ताजन होते हैं, वे परमात्मा का मनन करते हैं, उसे सारे ज्ञानों का मूल मानते हैं। ऐसे महानुभाव ज्ञान के वर्धक और सत्य के प्रचारक होते हुए अपने आत्मा को अध्यात्मयज्ञ के द्वारा पवित्र एवं अलङ्कृत करते हैं ॥७॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

दिव्य-जीवन

पदार्थान्वयभाषाः - [१] गत मन्त्र के अनुसार वेदवाणी को अपनानेवाले लोग (दिवक्षसः) = ज्ञान के प्रकाश में निवास करनेवाले होते हैं । (अग्निजिह्वाः) = अग्नि के समान प्रभावशालिनी जिह्वावाले होते हैं । इनके मुख से उच्चरित शब्द अपवित्रता व मलिनता को दग्ध करनेवाले होते हैं । (ऋतावृधः) = ये अपने जीवन में ऋत का वर्धन करनेवाले होते हैं । (ऋत) = यज्ञ का वर्धन तो ये करते ही हैं, साथ ही इनका जीवन बिलकुल ऋतवाला होता है, इनकी प्रत्येक क्रिया ठीक समय पर की जाती है । [२] ये देव (ऋतस्य योनिम्) = सब यज्ञों व सत्यों के उत्पत्ति स्थान प्रभु को [ऋतं च सत्यञ्चाभीद्धात्तपसो- ऽध्यजायत] (विमृशन्तः) = विचारते हुए (आसते) = आसीन होते हैं । ये प्रभु का चिन्तन करते हैं, प्रभु का चिन्तन 'ऋत के उत्पत्ति स्थान' के रूप में करते हैं । इस प्रकार चिन्तन करते हुए ये अपने जीवन को ऋतमय बनाने का प्रयत्न करते हैं। [३] ऋतमय जीवनवाले ये देव (द्यां स्कभित्वी) = मस्तिष्क रूप द्युलोक को धारण करके, अर्थात् अपने ज्ञान को उत्तम बनाकर (ओजसा) = ओजस्विता के साथ (अपः आचक्रुः) = अपने कर्त्तव्य कर्मों को करते हैं। इनके कर्म ज्ञानपूर्वक होते हैं, ज्ञानपूर्वक होने से ही इनके कर्म पवित्र होते हैं। इनके कर्म यज्ञात्मक बन जाते हैं । [४] (यज्ञं जनित्वी) = यज्ञों को जन्म देकर ये तन्वि शरीर में (निमामृजुः) = निश्चय से शोधन करनेवाले होते हैं। यज्ञात्मक कर्मों से इनका सारा जीवन ही पवित्र हो जाता है। इन कर्मों के होने पर शरीर में रोग नहीं आते, मन में राग-द्वेष का मैल नहीं होता और बुद्धि में कुण्ठता नहीं आ जाती। शरीर-मन-बुद्धि में पूर्ण शोधनवाले ये सचमुच देव होते हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- देव सदा प्रकाश में निवास करते हैं, इनके शब्द प्रभावशाली होते हैं, जीवन यज्ञमय होता है। यज्ञोपदेष्टा प्रभु का ये चिन्तन करते हैं। मस्तिष्क को ज्ञानपूर्ण करके ये शक्तिशाली कर्मों को करते हैं । यज्ञों के द्वारा जीवन को शुद्ध बनाते हैं।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (दिवक्षसः) ज्ञानप्रकाशं प्राप्नुवन्तः “दिवक्षाः-ये दिवं विज्ञानप्रकाशादिकमक्षन्ति प्राप्नुवन्ति” [ऋ० ३।३०।३१ दयानन्दः] (अग्निजिह्वाः) अग्निविद्याप्रकाशिका वाग्येषां ते “जिह्वा वाङ्नाम” [निघ० १।११] (ऋतावृधः) सत्यवर्धकाः (ऋतस्य योनिं विमृशन्तः-आसते) सत्यमूलं परमात्मानं विचारयन्तस्तिष्ठन्ति (द्यां स्कभित्वी) ज्ञानप्रकाशं स्कम्भयित्वा धारयित्वा (अपः-चक्रुः) कर्म “अपः कर्मनाम” [निघ० २।११] कुर्वन्ति (ओजसा यज्ञं जनित्वा) स्वात्मबलेनाध्यात्मयज्ञं प्रादुर्भाव्य (तन्वि निममृजुः) स्वात्मानम् “आत्मा वै तनूः” [श० ६।७।२।६] ‘द्वितीयास्थाने सप्तमी व्यत्ययेन’ शोधयन्ति अलङ्कुर्वन्ति ॥७॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Cosmic divinities clothed in light with tongues of fire observe and augment the law of cosmic yajna, and together, in a spirit of grateful union, sit at the centre with the central cause of all cosmic evolution. Holding the heavens high with their lustre, creating the waters of life, and lighting up and sustaining the yajna fire, they anoint themselves with divine grace.