Word-Meaning: - [१] (वसिष्ठः) = अपने निवास को उत्तम बनानेवाला मैं (देवान् ववन्दे) = देवों का वन्दन करता हूँ, उनको आदर देता हूँ । उन देवों को जो (अ-मृतान्) = विषयों के पीछे मरते नहीं, जो संसार के प्रति आसक्त नहीं । (ये) = जो (विश्वा भुवना अभि) = सब लोगों की ओर (प्रतस्थुः) = जाते हैं । दुःखितों के दुःख को दूर करने के लिये स्वयं उनके समीप पहुँचते हैं, 'सर्वभूतहिते रत' बनते हैं । [२] (ते) = वे देव (नः) = हमें (अद्य) = आज (उरुगायम्) = जिसका खूब ही गायन किया जाता है उस प्रभु को (रासन्ताम्) = दें। ये देव हमें प्रभु का ज्ञान देनेवाले हों और उस प्रभु के उपासन की वृत्ति को भी प्रात्त करायें। हे देवो ! (यूयम्) = आप (नः) = हमें (स्वस्तिभिः) = उत्तम स्थिति के द्वारा (सदा पात) = सदा रक्षित करो। देवों की कृपा से हमारा जीवन मंगलमय हो ।
Connotation: - भावार्थ - देवताओं का आदर करते हुए हम प्रभु का उपासन करनेवाले बनें और उन्हीं की तरह मंगल-मार्ग पर चलते हुए अपने कल्याण को सिद्ध कर सकें । सूक्त के प्रारम्भ में कहा था कि 'अग्नि आदि देव हमारे हृदयों को अपने ओज से भर दें' । [१] समाप्ति पर कहते हैं कि इनकी कृपा से हम प्रभु के उपासक बनें और मंगल मार्ग का आक्रमण करें, [१५] इन्हीं विश्वेदेवों से ही प्रार्थना है कि-