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दे॒वान्वसि॑ष्ठो अ॒मृता॑न्ववन्दे॒ ये विश्वा॒ भुव॑ना॒भि प्र॑त॒स्थुः । ते नो॑ रासन्तामुरुगा॒यम॒द्य यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभि॒: सदा॑ नः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

devān vasiṣṭho amṛtān vavande ye viśvā bhuvanābhi pratasthuḥ | te no rāsantām urugāyam adya yūyam pāta svastibhiḥ sadā naḥ ||

पद पाठ

दे॒वान् । वसि॑ष्ठः । अ॒मृता॑न् । व॒व॒न्दे॒ । ये । विश्वा॑ । भुव॑ना । अ॒भि । प्र॒ऽत॒स्थुः । ते । नः॒ । रा॒स॒न्ता॒म् । उ॒रु॒ऽगा॒यम् । अ॒द्य । यू॒यम् । पा॒त॒ । स्व॒स्तिऽभिः॑ । सदा॑ । नः॒ ॥ १०.६५.१५

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:65» मन्त्र:15 | अष्टक:8» अध्याय:2» वर्ग:11» मन्त्र:5 | मण्डल:10» अनुवाक:5» मन्त्र:15


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (वसिष्ठः) सर्व विषयों में अत्यन्त बसा हुआ (अमृतान् देवान्) जीवन्मुक्त विद्वानों को (ववन्दे) प्रशंसित करता है (ये विश्वा भुवना-अभि प्रतस्थुः) जो जीवन्मुक्त सारे ज्ञानों को अधिकार में रखते हैं (ते) वे (नः) हमारे लिए (अद्य) आज-इस जीवन में (उरुगायं रासन्ताम्) बहुत प्रशंसनीय ज्ञान-परमात्मज्ञान को दें (यूयं स्वस्तिभिः-नः सदा पात) हे विद्वानों ! तुम कल्याणवचनों से हमें सदा सुरक्षित रखो ॥१५॥
भावार्थभाषाः - नव स्नातक विद्वान् को अपनी विद्यावृद्धि के लिए अन्य ऊँचे विद्वानों, जीवन्मुक्तों से ज्ञानवृद्धि करके आत्मशान्ति प्राप्त करनी चाहिए, जो सबसे उत्कृष्ट वस्तु है ॥१५॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

देव- वन्दन

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (वसिष्ठः) = अपने निवास को उत्तम बनानेवाला मैं (देवान् ववन्दे) = देवों का वन्दन करता हूँ, उनको आदर देता हूँ । उन देवों को जो (अ-मृतान्) = विषयों के पीछे मरते नहीं, जो संसार के प्रति आसक्त नहीं । (ये) = जो (विश्वा भुवना अभि) = सब लोगों की ओर (प्रतस्थुः) = जाते हैं । दुःखितों के दुःख को दूर करने के लिये स्वयं उनके समीप पहुँचते हैं, 'सर्वभूतहिते रत' बनते हैं । [२] (ते) = वे देव (नः) = हमें (अद्य) = आज (उरुगायम्) = जिसका खूब ही गायन किया जाता है उस प्रभु को (रासन्ताम्) = दें। ये देव हमें प्रभु का ज्ञान देनेवाले हों और उस प्रभु के उपासन की वृत्ति को भी प्रात्त करायें। हे देवो ! (यूयम्) = आप (नः) = हमें (स्वस्तिभिः) = उत्तम स्थिति के द्वारा (सदा पात) = सदा रक्षित करो। देवों की कृपा से हमारा जीवन मंगलमय हो ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - देवताओं का आदर करते हुए हम प्रभु का उपासन करनेवाले बनें और उन्हीं की तरह मंगल-मार्ग पर चलते हुए अपने कल्याण को सिद्ध कर सकें । सूक्त के प्रारम्भ में कहा था कि 'अग्नि आदि देव हमारे हृदयों को अपने ओज से भर दें' । [१] समाप्ति पर कहते हैं कि इनकी कृपा से हम प्रभु के उपासक बनें और मंगल मार्ग का आक्रमण करें, [१५] इन्हीं विश्वेदेवों से ही प्रार्थना है कि-
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (वसिष्ठः) सर्वविषयेषु वसितृतमः (अमृतान् देवान्) जीवन्मुक्तान् विदुषः (ववन्दे) अभिवन्दति (ये विश्वा भुवना-अभि प्रतस्थुः) ये जीवन्मुक्ताः सर्वाणि ज्ञानानि-अधिकारेण प्रतिष्ठन्ति (ते) ते खलु (नः) अस्मभ्यम् (अद्य) अस्मिन् काले जीवने (उरुगायं रासन्ताम्) बहुप्रशंसनीयं ज्ञानं परमात्मज्ञानं प्रयच्छतु (यूयं स्वस्तिभिः-नः सदा पात) हे विद्वांसो ! यूयं कल्याणवचनैरस्मान् सदा रक्षत ॥१५॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - The most brilliant sage celebrates and adores the immortals who abide in all regions of the world. May they now give us universal knowledge and vision of the highest adorable lord divine. O Vishvedevas, pray always protect and promote us with all that is good for total well being of life.