स्वास्थ्य तथा अभ्युदय व निःश्रेयस का साधन
Word-Meaning: - [१] हमारे जीवनों में 'सरस्वती - सरयु - सिन्धु' इन तीन नदियों का प्रवाह निरन्तर चलता है। 'कर्णाविमौ नासिके चक्षणी मुखम्' दो कान, दो नासिकाछिद्र, दो आँखें व मुख ये सात ऋषि व सात होता कहलाते हैं। इनके द्वारा उल्लिखित तीन नदियों का प्रवाह चला करता है । 'सरस्वती' ज्ञान की प्रतीक है, 'सरयु' [सृ गति, यु - मिश्रणे ] उस गति का जो हमें प्रभु से मिलाती है, अर्थात् उपासना का सूचन करती है, और 'सिन्धु' [ स्यन्दते ] = जल के प्रवाह की तरह स्वाभाविक रूप से चलनेवाले कर्म-प्रवाह की द्योतक है । उल्लिखित सात ऋषियों से ये ज्ञान, उपासना व कर्म के प्रवाह चलाये जाते हैं । इन्हें ही यहाँ 'त्रिः सप्त 'इक्कीस प्रकार की (सस्त्राः) = बहनेवाली (नद्यः) = नदियाँ कहा है। इनको हम ऊतये रक्षण के लिये (हवामहे) = पुकारते हैं। ये सातों होता अपना कार्य ठीक से करते रहें तो हम स्वस्थ रहते हैं । [२] (महीः अपः) = महनीय जलों को हम रक्षण के लिये पुकारते हैं। जल स्वास्थ्य के लिये अत्यन्त उपयोगी हैं, 'जलवायु की अनुकूलता' इस वाक्यांश विन्यास में जल का स्वास्थ्य के लिये महत्त्व स्पष्ट है । (वनस्पतीन्) = वनस्पतियों को हम रक्षण के लिये पुकारते हैं। 'वन' शब्द घर का वाचक है, यहां यह घर शरीर के रूप में है। इस शरीर गृह के रक्षक ये ‘वनस्पति' हैं। (पर्वतान्) = पर्वतों को हम रक्षण के लिये पुकारते हैं । जीवनरक्षण में इनका स्थान भी महत्त्वपूर्ण है, कई रोगों में तो पर्वत के वायु का सेवन आवश्यक ही हो जाता है । [३] (अग्निम्) = अग्नि को हम रक्षण के लिये पुकारते हैं। अग्नि शान्त हो जाता है तो शरीर भी ठण्डा पड़कर मृत हो जाता है। इस अग्नि को ही 'कृशानुं' विशेषण से यहां स्मरण किया गया है, उस अग्नि को हम पुकारते हैं जो कि 'कृशं आनयति' कृश को फिर से प्राणशक्ति सम्पन्न कर देता है । (अतॄन्) = [स्तृ=to kill] उन सब तत्त्वों को हम रक्षण के लिये पुकारते हैं जो न हिंसा करनेवाले हैं। इस प्रकार हिंसा न होने देनेवाले इन तत्त्वों के द्वारा हमारे शरीर का रक्षण समुचित रूप में हो पाता है। [४] शरीर को स्वस्थ बनाकर (तिष्यम्) = हम तिष्य को पुकारते हैं। 'तिष्य' का पर्याय 'पुष्य' है, सांसारिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये आवश्यक धनों का पोषण अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है यही 'अभ्युदय' कहलाता है, इसी में स्वस्थ जीवनवाला व्यक्ति [तुष्यन्त्यस्मिन् इति तिष्यः ] सन्तोष का अनुभव करता है। [५] सांसारिक उत्त्थान का संकेत करने के बाद अध्यात्म उत्त्थान के लिये कहते हैं कि हम (सधस्थे) = आत्मा व परमात्मा के मिलकर रहने के स्थान हृदय में हम (रुद्रम्) = उस [रुत्-र] सृष्टि के प्रारम्भ में ज्ञानोपदेश देनेवाले प्रभु को (आ हवामहे) = सब प्रकार से पुकारते हैं, जो प्रभु (रुद्रेषु रुद्रियम्) = रुद्रों में सर्वाधिक रुद्रिय हैं, रुद्र नाम के योग्य हैं। 'स पूर्वेषामपि गुरु: ० ' वे प्रभु गुरुओं के गुरु तो हैं ही। इस प्रभु को पुकारना मेरी अध्यात्म उन्नति का मूल बनता है, यह अन्ततः मेरे निःश्रेयस का साधक होता है।
Connotation: - भावार्थ- इन्द्रियों के कार्यप्रवाह के ठीक होने से तथा जलादि तत्त्वों की अनुकूलता से हम स्वस्थ बनते हैं । और स्वस्थ शरीर से 'अभ्युदय व निःश्रेयस' रूप धर्म का साधन करते हैं ।