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त्रिः स॒प्त स॒स्रा न॒द्यो॑ म॒हीर॒पो वन॒स्पती॒न्पर्व॑ताँ अ॒ग्निमू॒तये॑ । कृ॒शानु॒मस्तॄ॑न्ति॒ष्यं॑ स॒धस्थ॒ आ रु॒द्रं रु॒द्रेषु॑ रु॒द्रियं॑ हवामहे ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

triḥ sapta sasrā nadyo mahīr apo vanaspatīn parvatām̐ agnim ūtaye | kṛśānum astṝn tiṣyaṁ sadhastha ā rudraṁ rudreṣu rudriyaṁ havāmahe ||

पद पाठ

त्रिः । स॒प्त । स॒स्राः । न॒द्यः॑ । म॒हीः । अ॒पः । वन॒स्पती॒न् । पर्व॑तान् । अ॒ग्निम् । ऊ॒तये॑ । कृ॒शानु॑म् । अस्तॄ॑न् । ति॒ष्य॑म् । स॒धऽस्थे॑ । आ । रु॒द्रम् । रु॒द्रेषु॑ । रु॒द्रिय॑म् । ह॒वा॒म॒हे॒ ॥ १०.६४.८

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ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:64» मन्त्र:8 | अष्टक:8» अध्याय:2» वर्ग:7» मन्त्र:3 | मण्डल:10» अनुवाक:5» मन्त्र:8


ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (त्रिः सप्त) तीन लोकों में सात रश्मियों (सस्राः-नद्यः) बहती हुई नदियों (महीः-अपः) बहुतेरी जलधाराओं (वनस्पतीन्) ओषधि वनस्पतियों (पर्वतान्) पर्वतों (अग्निम्) अग्नि को (ऊतये) रक्षा के लिए (कृशानुम्) विद्युत् को (अस्तॄन्) मेघों को फेंकनेवाली हवाओं को (तिष्यम्) सूर्य को (रुद्रेषु रुद्रियं रुद्रम्) अग्नियों में होमवाली अग्नि को (सधस्थं-आ हवामहे) अपने समानस्थान में सम्मलेन में होमयज्ञ में भलीप्रकार प्रयोग करते हैं ॥८॥
भावार्थभाषाः - तीनों लोकों में फैली हुई सूर्य की रश्मियों तथा नदी और जलधाराओं, पर्वतों, विद्युत्, अग्नि, सूर्य मेघक्षेपक हवाओं का उपयोग विशेष विज्ञान तथा होम के द्वारा लेना चाहिए ॥८॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

स्वास्थ्य तथा अभ्युदय व निःश्रेयस का साधन

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हमारे जीवनों में 'सरस्वती - सरयु - सिन्धु' इन तीन नदियों का प्रवाह निरन्तर चलता है। 'कर्णाविमौ नासिके चक्षणी मुखम्' दो कान, दो नासिकाछिद्र, दो आँखें व मुख ये सात ऋषि व सात होता कहलाते हैं। इनके द्वारा उल्लिखित तीन नदियों का प्रवाह चला करता है । 'सरस्वती' ज्ञान की प्रतीक है, 'सरयु' [सृ गति, यु - मिश्रणे ] उस गति का जो हमें प्रभु से मिलाती है, अर्थात् उपासना का सूचन करती है, और 'सिन्धु' [ स्यन्दते ] = जल के प्रवाह की तरह स्वाभाविक रूप से चलनेवाले कर्म-प्रवाह की द्योतक है । उल्लिखित सात ऋषियों से ये ज्ञान, उपासना व कर्म के प्रवाह चलाये जाते हैं । इन्हें ही यहाँ 'त्रिः सप्त 'इक्कीस प्रकार की (सस्त्राः) = बहनेवाली (नद्यः) = नदियाँ कहा है। इनको हम ऊतये रक्षण के लिये (हवामहे) = पुकारते हैं। ये सातों होता अपना कार्य ठीक से करते रहें तो हम स्वस्थ रहते हैं । [२] (महीः अपः) = महनीय जलों को हम रक्षण के लिये पुकारते हैं। जल स्वास्थ्य के लिये अत्यन्त उपयोगी हैं, 'जलवायु की अनुकूलता' इस वाक्यांश विन्यास में जल का स्वास्थ्य के लिये महत्त्व स्पष्ट है । (वनस्पतीन्) = वनस्पतियों को हम रक्षण के लिये पुकारते हैं। 'वन' शब्द घर का वाचक है, यहां यह घर शरीर के रूप में है। इस शरीर गृह के रक्षक ये ‘वनस्पति' हैं। (पर्वतान्) = पर्वतों को हम रक्षण के लिये पुकारते हैं । जीवनरक्षण में इनका स्थान भी महत्त्वपूर्ण है, कई रोगों में तो पर्वत के वायु का सेवन आवश्यक ही हो जाता है । [३] (अग्निम्) = अग्नि को हम रक्षण के लिये पुकारते हैं। अग्नि शान्त हो जाता है तो शरीर भी ठण्डा पड़कर मृत हो जाता है। इस अग्नि को ही 'कृशानुं' विशेषण से यहां स्मरण किया गया है, उस अग्नि को हम पुकारते हैं जो कि 'कृशं आनयति' कृश को फिर से प्राणशक्ति सम्पन्न कर देता है । (अतॄन्) = [स्तृ=to kill] उन सब तत्त्वों को हम रक्षण के लिये पुकारते हैं जो न हिंसा करनेवाले हैं। इस प्रकार हिंसा न होने देनेवाले इन तत्त्वों के द्वारा हमारे शरीर का रक्षण समुचित रूप में हो पाता है। [४] शरीर को स्वस्थ बनाकर (तिष्यम्) = हम तिष्य को पुकारते हैं। 'तिष्य' का पर्याय 'पुष्य' है, सांसारिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये आवश्यक धनों का पोषण अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है यही 'अभ्युदय' कहलाता है, इसी में स्वस्थ जीवनवाला व्यक्ति [तुष्यन्त्यस्मिन् इति तिष्यः ] सन्तोष का अनुभव करता है। [५] सांसारिक उत्त्थान का संकेत करने के बाद अध्यात्म उत्त्थान के लिये कहते हैं कि हम (सधस्थे) = आत्मा व परमात्मा के मिलकर रहने के स्थान हृदय में हम (रुद्रम्) = उस [रुत्-र] सृष्टि के प्रारम्भ में ज्ञानोपदेश देनेवाले प्रभु को (आ हवामहे) = सब प्रकार से पुकारते हैं, जो प्रभु (रुद्रेषु रुद्रियम्) = रुद्रों में सर्वाधिक रुद्रिय हैं, रुद्र नाम के योग्य हैं। 'स पूर्वेषामपि गुरु: ० ' वे प्रभु गुरुओं के गुरु तो हैं ही। इस प्रभु को पुकारना मेरी अध्यात्म उन्नति का मूल बनता है, यह अन्ततः मेरे निःश्रेयस का साधक होता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- इन्द्रियों के कार्यप्रवाह के ठीक होने से तथा जलादि तत्त्वों की अनुकूलता से हम स्वस्थ बनते हैं । और स्वस्थ शरीर से 'अभ्युदय व निःश्रेयस' रूप धर्म का साधन करते हैं ।

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (त्रिः सप्त) त्रिः-त्रिषु लोकेषु ये सप्त रश्मीन् (सस्राः-नद्यः) सरन्तीः-नदीः (महीः-अपः) बह्वीः-अपो बहूनि जलानि (वनस्पतीन्) ओषधिवनस्पतीन् (पर्वतान्) गिरीन् (अग्निम्) अग्निपदार्थं (ऊतये) रक्षायै (कृशानुम्) विद्युतम् “कृशानोः-विद्युतः” [ऋ०  १।१५५।२ दयानन्दः] (अस्तॄन्) मेघक्षेप्तॄन् मेघस्थजलप्रक्षेप्तॄन् वायून् (तिष्यम्) सूर्यम् “तिष्यः-आदित्यः” [ऋ० ५।५४।१३ दयानन्दः] (रुद्रेषु रुद्रियं रुद्रम्) अग्निषु “अग्निरपि रुद्र उच्यते” [निरु० १०।७] होम्यमग्निं (सधस्थे-आ हवामहे) स्वकीयसमानस्थाने सम्मेलने होमयज्ञे वा समन्तात् प्रयुञ्जामहे ॥८॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - For our protection and advancement, in our yajnic sessions we invoke and exalt thrice seven rays of energy active in the three regions of heaven, earth and the sky, the flowing streams, floods of water and vapour great and greater, herbs and trees, clouds and mountains, various orders of fire energy, electric energy, catalytic currents of cloud breaking energy, solar energy and the yajnic fire which destroys the negativities of the environment.