Word-Meaning: - [१] हे जीवो! (वः वायुम्) = तुम्हारे गति देनेवाले, (रथ-युजम्) = शरीर रूप रथ को उत्तम इन्द्रियाश्वों से युक्त करनेवाले (पुरन्धिम्) = पूरक व पालक बुद्धि को देनेवाले (पूषणम्) = सब के पोषक उस प्रभु को (स्तोमैः) = स्तुतियों के द्वारा (सख्याय प्रकृणुध्वम्) = मित्रता के लिये उत्तमता से करो । स्तुति के द्वारा हम प्रभु को अपना मित्र बनायें। वे प्रभु ही हमें शक्ति देकर गतिशील बनाते हैं, सब इन्द्रिय-शक्तियाँ प्रभु से ही प्राप्त होती हैं, प्रभु ही हमें उत्तम बुद्धि देते हैं । [२] (ते) = वे प्रभु को मित्र बनानेवाले (सचितः) = ज्ञानी पुरुष (सचेतसः) = समानचित्तवाले होकर (हि) = निश्चय से (सवितुः देवस्य) = सब के प्रेरक दिव्यगुणों के पुञ्ज प्रभु के (सवीमनि) = प्रेरण में (क्रतुं सचन्ते) = यज्ञों का सेवन करते हैं। प्रभु को ये मित्र बनाते हैं और उस मित्र की प्रेरणा के अनुसार उत्तम कर्मों को करनेवाले होते हैं। प्रभु ने जिन यज्ञों का उपदेश दिया है, उन यज्ञों में ये तत्पर रहते हैं ।
Connotation: - भावार्थ-स्तवन के द्वारा हम प्रभु के मित्र बनते हैं, उस मित्र की प्रेरणा के अनुसार यज्ञों में प्रवृत्त होते हैं। हमारे यज्ञ ज्ञानपूर्वक होते हैं [सचितः] और अप्रमाद के साथ होते हैं [ सचेतसः] ।