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प्र वो॑ वा॒युं र॑थ॒युजं॒ पुरं॑धिं॒ स्तोमै॑: कृणुध्वं स॒ख्याय॑ पू॒षण॑म् । ते हि दे॒वस्य॑ सवि॒तुः सवी॑मनि॒ क्रतुं॒ सच॑न्ते स॒चित॒: सचे॑तसः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

pra vo vāyuṁ rathayujam puraṁdhiṁ stomaiḥ kṛṇudhvaṁ sakhyāya pūṣaṇam | te hi devasya savituḥ savīmani kratuṁ sacante sacitaḥ sacetasaḥ ||

पद पाठ

प्र । वः॒ । वा॒युम् । र॒थ॒ऽयुज॑म् । पुर॑म्ऽधिम् । स्तोमैः॑ । कृ॒णु॒ध्व॒म् । स॒ख्याय॑ । पू॒षण॑म् । ते । हि । दे॒वस्य॑ । स॒वि॒तुः । सवी॑मनि । क्रतु॑म् । सच॑न्ते । स॒ऽचितः॑ । सऽचे॑तसः ॥ १०.६४.७

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ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:64» मन्त्र:7 | अष्टक:8» अध्याय:2» वर्ग:7» मन्त्र:2 | मण्डल:10» अनुवाक:5» मन्त्र:7


ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (वः) हे जीवन्मुक्त विद्वानों ! तुम (रथयुजं वायुम्) रमणीय मोक्ष को योजित करने-प्राप्त करानेवाले सर्वत्र विभु गतिमान् (पुरन्धिम्) बहुविध संसार को धारण करने-वाले (पूषणम्) पुष्टिकर्त्ता परमात्मा को (स्तोमैः सख्याय प्रकृणुध्वम्) स्तुतिसमूहों द्वारा मित्रता के लिए सत्कृत करो (ते हि) जो तुम्हारे जैसे विद्वान् होते हैं, वे (सवितुः-देवस्य सवीमनि) उत्पादक परमात्मदेव के उत्पन्न किये संसार में (सचितः-सचेतसः) समानज्ञान सावधान हुए-हुए (क्रतुं सचन्ते) श्रेष्ठकर्म को सेवन करते हैं ॥७॥
भावार्थभाषाः - जीवन्मुक्त विद्वान् परमात्मा की मित्रता करने के लिए उसका स्तुतियों द्वारा सत्कार करते हैं, जो कि मोक्ष का प्रदान करनेवाला है। उस ऐसे परमात्मा को अपना इष्टदेव मान कर ही उसकी प्राप्ति के लिए सदाचरण किया करते हैं ॥७॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

प्रभु की प्रेरणाएँ

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे जीवो! (वः वायुम्) = तुम्हारे गति देनेवाले, (रथ-युजम्) = शरीर रूप रथ को उत्तम इन्द्रियाश्वों से युक्त करनेवाले (पुरन्धिम्) = पूरक व पालक बुद्धि को देनेवाले (पूषणम्) = सब के पोषक उस प्रभु को (स्तोमैः) = स्तुतियों के द्वारा (सख्याय प्रकृणुध्वम्) = मित्रता के लिये उत्तमता से करो । स्तुति के द्वारा हम प्रभु को अपना मित्र बनायें। वे प्रभु ही हमें शक्ति देकर गतिशील बनाते हैं, सब इन्द्रिय-शक्तियाँ प्रभु से ही प्राप्त होती हैं, प्रभु ही हमें उत्तम बुद्धि देते हैं । [२] (ते) = वे प्रभु को मित्र बनानेवाले (सचितः) = ज्ञानी पुरुष (सचेतसः) = समानचित्तवाले होकर (हि) = निश्चय से (सवितुः देवस्य) = सब के प्रेरक दिव्यगुणों के पुञ्ज प्रभु के (सवीमनि) = प्रेरण में (क्रतुं सचन्ते) = यज्ञों का सेवन करते हैं। प्रभु को ये मित्र बनाते हैं और उस मित्र की प्रेरणा के अनुसार उत्तम कर्मों को करनेवाले होते हैं। प्रभु ने जिन यज्ञों का उपदेश दिया है, उन यज्ञों में ये तत्पर रहते हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ-स्तवन के द्वारा हम प्रभु के मित्र बनते हैं, उस मित्र की प्रेरणा के अनुसार यज्ञों में प्रवृत्त होते हैं। हमारे यज्ञ ज्ञानपूर्वक होते हैं [सचितः] और अप्रमाद के साथ होते हैं [ सचेतसः] ।

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (वः) हे जीवन्मुक्ता विद्वांसः ! यूयम् ‘विभक्तिव्यत्ययः’ (रथयुजं वायुम्) रमणीयमोक्षे योजयति-प्रापयति यस्तं सर्वत्र विभुगतिकं (पुरन्धिम्) पुरुं बहुविधं संसारं धारयति यस्तं (पूषणम्) पोषयितारं परमात्मानं (स्तोमैः-सख्याय प्रकृणुध्वम्) स्तुतिसमूहैः सख्याय सखित्वाय सत्कृतं कुरुत (ते हि) युष्मादृशास्ते खलु (सवितुः-देवस्य सवीमनि) उत्पादकस्य परमात्मदेवस्य-उत्पादिते जगति (सचितः-सचेतसः) समानज्ञानाः सावधानाः सन्तः (क्रतुं सचन्ते) श्रेष्ठकर्म सेवन्ते ॥७॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O yajakas, by your programmed yajnic sessions of scientific endeavour, study the munificent Vayu and Pusha, realise and harness the motive energy of wind usable in chariot and also the nourishing and invigorating power of nature as friends of life for the service of humanity. Both Vayu and Pusha in this cosmic yajna of Savita, lord creator and sustainer, are efficacious and together take life’s growth and evolution forwards.