Word-Meaning: - [१] (ते) = वे (अर्वन्तः) = वासनाओं का संहार करनेवाले, (हवनश्रुतः) = हीन व आर्तजनों की पुकार को सुननेवाले, (वाजिनः) = शक्तिशाली, (मितद्रवः) = नपी-तुली गतिवाले, (सहस्रसाः) = सहस्र - संख्याक धनों को देनेवाले अथवा [स+हस्] प्रसन्नतापूर्वक देनेवाले (विश्वे) = सब देव (नः) = हमारी (हवम्) = पुकार को व प्रार्थना को (शृण्वन्तु) = सुनें । देव जनों के लक्षण यहाँ बड़ी सुन्दरता से कह दिये गये हैं । ये [क] वासनाओं से ऊपर उठते हैं, [ख] आर्तों के क्रन्दन को सुनते हैं, [२] शक्तिशाली बनते हैं, [घ] नपी-तुली गतिवाले होते हैं और [ङ] दानशील होते हैं। हम इनके सम्पर्क में आयें, इनके प्रिय हों, हमारी आवाज इनसे सुनी जाए। [२] उन देवों से हमारी बात सुनी जाए (ये) = जो (मेधसातौ इव) = यज्ञों की तरह (समिथेषु) = संग्रामों में भी (महः धनम्) = महत्त्वपूर्ण ऐश्वर्य को (त्मना) = स्वयं (जाभ्रिरे) = प्राप्त करते हैं । ये देव यज्ञों में प्रवृत्त होते हैं । ये यज्ञ इन्हें इस लोक व परलोक दोनों लोकों में कल्याण को देनेवाले होते हैं। इसी प्रकार ये वासनाओं के साथ संग्राम में चलते हैं और यह वासनाओं के साथ होनेवाला संग्राम इनकी शक्ति की व ऐश्वर्य की वृद्धि का कारण बनता है। इन देवों के सम्पर्क में हम भी यज्ञों में व इन अध्यात्म-संग्रामों में चलते हुए उत्कृष्ट ऐश्वर्य के भागी बनते हैं ।
Connotation: - भावार्थ- देवों के सम्पर्क में आकर हम भी देव बनें। हम भी उनकी तरह 'वासनाओं का संहार करनेवाले, दीनजनों की पुकार को सुननेवाले, शक्तिशाली, युक्तचेष्ट व दानी बनें।