Word-Meaning: - [१] (नृचक्षसः) = सब मनुष्यों का ध्यान करनेवाले, केवल अपने स्वार्थ को न देखनेवाले, (अनिमिषन्तः) = प्रमाद व आलस्य न करनेवाले, (अर्हणा) = प्रभु अर्चना के द्वारा (बृहद् देवास:) = वर्धनशील देववृत्ति के पुरुष (अमृतत्वम्) = अमृतत्व को (आनशुः) = प्राप्त करते हैं। अमृतत्व की प्राप्ति के लिये आवश्यक है कि [क] हम केवल अपने लिये न जियें, [ख] प्रमाद व आलस्य से रहित हों, [ग] पूजा की वृत्ति को अपनाकर अपने में दिव्यगुणों का वर्धन करें। [२] (ज्योतीरथाः) = ज्योतिर्मय रथवाले, जिनका यह शरीर रथ ज्ञान के प्रकाश से प्रकाशित हो रहा है। (अहि मायाः) = अहीन प्रज्ञावाले, जिनकी बुद्धि में किसी प्रकार की न्यूनता नहीं । (अनागसः) = जिनका जीवन निष्पाप है । ऐसे ये व्यक्ति (दिवः वर्ष्माणम्) = द्युलोक के समुच्छ्रित प्रदेश में, अर्थात् ज्ञान के शिखर पर वसते-निवास करते हैं, ऊँच से ऊँचे ज्ञानी होते हैं। ये ज्ञानी पुरुष स्वस्तये उत्तम जीवन की स्थिति के लिये होते हैं।
Connotation: - ये भावार्थ - ज्ञानी पुरुष केवल अपने लिये नहीं जीते। प्रभु-पूजन से दिव्यगुणों का वर्धन करके अमृतत्व को प्राप्त करते हैं। ये प्रकाशमय अहीनप्रज्ञ व निष्पाप होते हैं।