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नृ॒चक्ष॑सो॒ अनि॑मिषन्तो अ॒र्हणा॑ बृ॒हद्दे॒वासो॑ अमृत॒त्वमा॑नशुः । ज्यो॒तीर॑था॒ अहि॑माया॒ अना॑गसो दि॒वो व॒र्ष्माणं॑ वसते स्व॒स्तये॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

nṛcakṣaso animiṣanto arhaṇā bṛhad devāso amṛtatvam ānaśuḥ | jyotīrathā ahimāyā anāgaso divo varṣmāṇaṁ vasate svastaye ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

नृ॒ऽचक्ष॑सः । अनि॑ऽमिषन्तः । अ॒र्हणा॑ । बृ॒हत् । दे॒वासः॑ । अ॒मृ॒त॒ऽत्वम् । आ॒न॒शुः॒ । ज्यो॒तिःऽर॑थाः । अहि॑ऽमायाः । अना॑गसः । दि॒वः । व॒र्ष्माण॑म् । व॒स॒ते॒ । स्व॒स्तये॑ ॥ १०.६३.४

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ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:63» मन्त्र:4 | अष्टक:8» अध्याय:2» वर्ग:3» मन्त्र:4 | मण्डल:10» अनुवाक:5» मन्त्र:4


ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (देवासः) वे विद्वान् (नृचक्षसः) नरों के चेतानेवाले (अनिमिषन्तः) अपने कर्त्तव्यों में निमेष-अन्तर न करते हुए (अर्हणा) सर्वथा योग्य (बृहत्-अमृतत्वम्-आनशुः) महान् अमृत तत्त्व-मोक्षसुख को प्राप्त करते हैं (ज्योतिः-रथाः) ज्ञानप्रकाश में रमण जिनका है, वे (अहिमायाः) न हनन करने योग्य प्रज्ञावाले (अनागसः) पापरहित (दिवः-वर्ष्माणम्) मोक्ष के सुखवर्षक पद को (स्वस्तये वसते) कल्याण करने के लिए आच्छादन करते हैं ॥४॥
भावार्थभाषाः - अकुण्ठित बुद्धिवाले अपने कर्त्तव्यों में अन्तर न करनेवाले पापरहित होकर मोक्षसुख को प्राप्त करते हैं और संसार में भी कल्याण को, जो अपने ऊपर आच्छादित है ॥४॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

अहीन-यज्ञ व निष्पाप

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (नृचक्षसः) = सब मनुष्यों का ध्यान करनेवाले, केवल अपने स्वार्थ को न देखनेवाले, (अनिमिषन्तः) = प्रमाद व आलस्य न करनेवाले, (अर्हणा) = प्रभु अर्चना के द्वारा (बृहद् देवास:) = वर्धनशील देववृत्ति के पुरुष (अमृतत्वम्) = अमृतत्व को (आनशुः) = प्राप्त करते हैं। अमृतत्व की प्राप्ति के लिये आवश्यक है कि [क] हम केवल अपने लिये न जियें, [ख] प्रमाद व आलस्य से रहित हों, [ग] पूजा की वृत्ति को अपनाकर अपने में दिव्यगुणों का वर्धन करें। [२] (ज्योतीरथाः) = ज्योतिर्मय रथवाले, जिनका यह शरीर रथ ज्ञान के प्रकाश से प्रकाशित हो रहा है। (अहि मायाः) = अहीन प्रज्ञावाले, जिनकी बुद्धि में किसी प्रकार की न्यूनता नहीं । (अनागसः) = जिनका जीवन निष्पाप है । ऐसे ये व्यक्ति (दिवः वर्ष्माणम्) = द्युलोक के समुच्छ्रित प्रदेश में, अर्थात् ज्ञान के शिखर पर वसते-निवास करते हैं, ऊँच से ऊँचे ज्ञानी होते हैं। ये ज्ञानी पुरुष स्वस्तये उत्तम जीवन की स्थिति के लिये होते हैं।
भावार्थभाषाः - ये भावार्थ - ज्ञानी पुरुष केवल अपने लिये नहीं जीते। प्रभु-पूजन से दिव्यगुणों का वर्धन करके अमृतत्व को प्राप्त करते हैं। ये प्रकाशमय अहीनप्रज्ञ व निष्पाप होते हैं।

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (देवासः) ते विद्वांसः (नृचक्षसः) नराणां ख्यापकाः (अनिमिषन्तः) स्वकर्तव्येषु निमेषमन्तरं न कुर्वन्तः (अर्हणा) सर्वथा योग्याः “आकारादेशश्छान्दसः” (बृहत्-अमृतत्वम्-आनशुः) महदमृतत्वं मोक्षसुखं प्राप्नुवन्ति (ज्योतिः रथाः) ज्योतिषि ज्ञानप्रकाशे रमणं येषां ते (अहिमायाः) अहन्तव्यप्रज्ञाकाः (अनागसः) पापरहिताः (दिवः-वर्ष्माणम्) मोक्षस्य सुखवर्षकं पदं (स्वस्तये वसते) कल्याणकरणायाच्छादयन्ति ॥४॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Ever watchful inspirers of humanity, active without a wink, adorable in their own right, mighty brilliant and generous, they attain to the freedom of immortality. They ride the chariot of light and, inviolable of might and free from sin and evil, they abide on top of heaven. May they come and bless our yajna for the good and all round well being of life. Serve them, exhilarate them, be grateful and rejoice.