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इन्द्रे॑ण यु॒जा निः सृ॑जन्त वा॒घतो॑ व्र॒जं गोम॑न्तम॒श्विन॑म् । स॒हस्रं॑ मे॒ दद॑तो अष्टक॒र्ण्य१॒॑: श्रवो॑ दे॒वेष्व॑क्रत ॥

English Transliteration

indreṇa yujā niḥ sṛjanta vāghato vrajaṁ gomantam aśvinam | sahasram me dadato aṣṭakarṇyaḥ śravo deveṣv akrata ||

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Pad Path

इन्द्रे॑ण । यु॒जा । निः । सृ॒ज॒न्त॒ । वा॒घतः॑ । व्र॒जम् । गोऽम॑न्तम् । अ॒श्विन॑म् । स॒हस्र॑म् । मे॒ । दद॑तः । अ॒ष्ट॒ऽक॒र्ण्यः॑ । श्रवः॑ । दे॒वेषु॑ । अ॒क्र॒त॒ ॥ १०.६२.७

Rigveda » Mandal:10» Sukta:62» Mantra:7 | Ashtak:8» Adhyay:2» Varga:2» Mantra:2 | Mandal:10» Anuvak:5» Mantra:7


BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (वाघतः) वे मेधावी विद्वान् (इन्द्रेण युजा) ऐश्वर्यवान् परमात्मा के सहयोगी (गोमन्तं अश्विनं व्रजम्) इन्द्रियवाले, इन्द्रियसम्बन्धी ज्ञान तथा मनसम्बन्धी ज्ञान को मनुष्यों के लिए (निसृजन्त) उपदेश देते हैं (अष्टकर्ण्यः) व्याप्त इद्रिय शक्तिवाले विद्वान् (मे सहस्रं ददतः) मेरे लिए बहुत ज्ञान देते हुए (देवेषु श्रवः-अक्रत) इन्द्रियों में यश सम्पादित करें ॥७॥
Connotation: - परमात्मा से सम्पर्क करनेवाले मेधावी ऋषि जन अन्य जनों को इन्द्रियों के संयम एवं मन के विकासार्थ ज्ञान का उपदेश अधिक से अधिक देते रहें ॥७॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

गोमान् अश्ववान् व्रज

Word-Meaning: - [१] (वाघतः) = ज्ञान का वहन करनेवाले मेधावी ऋत्विज् (इन्द्रेण युजा) = उस प्रभु रूप मित्र के साथ (गोमन्तम्) = प्रशस्त ज्ञानेन्द्रियों से बने (व्रजम्) = इस इन्द्रियसमूह को तथा (अश्विनम्) = प्रशस्त कर्मेन्द्रियों से बने इस इन्द्रियसमूह को (निःसृजन्त) = विषयपंक से बाहिर निकाल लेते हैं। ये लोग इन्द्रियों को विषयपंक में नहीं फँसने देते। इसके लिये वे प्रभु का स्मरण करते हैं, प्रभु की मित्रता का परिणाम होता है कि वे वासनाओं को जीत लेते हैं और इन्द्रियों को सुरक्षित कर पाते हैं। [२] ये (अष्टकर्ण्यः) = व्याप्त कर्णोंवाले, अर्थात् ज्ञान का खूब श्रवण करनेवाले (सहस्त्रम्) = [स+हस्] प्रसन्नतापूर्वक (मे) = मेरे प्रति अपने को देते हुए अथवा खूब दान करते हुए, (देवेषु) = दिव्यगुणों के विषय में (श्रवः) = अपनी कीर्ति को अक्रत फैलाते हैं। ज्ञान को प्राप्त करते हैं, और त्यागशील बनते हैं । ये दोनों बातें मिलकर उनके अन्दर दिव्यगुणों का वर्धन करनेवाली होती हैं। इन दिव्यगुणों के कारण उनका चारों ओर यश फैलता है ।
Connotation: - भावार्थ- प्रभु को मित्र बनाकर ज्ञानी पुरुष इन्द्रियों को सुरक्षित करते हैं । ये खूब ज्ञान प्राप्त करते हैं, त्यागशील होते हैं। और इस प्रकार अपने दिव्यगुणों के कारण कीर्तिवाले होते हैं ।

BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (वाघतः) ते मेधाविनो विद्वांसः “वाघतः-मेधाविनाम” [निघण्टु ३।१८] (इन्द्रेण युजा) ऐश्वर्यवता परमात्मना सह योगिना सह (गोमन्तम्-अश्विनं व्रजं निः सृजन्त) इन्द्रियवन्तमिन्द्रियसम्बन्धिनं मनःसम्बन्धिनं [व्रजं ज्ञानं ऋ० १।१०।७ दयानन्दः] जनेभ्यो निसृजन्ति उपदिशन्ति (अष्टकर्ण्यः) व्याप्तकर्णवन्तः-व्याप्तेन्द्रियशक्तिकास्ते विद्वांसः (मे सहस्रं ददतः) मह्यं सहस्रं बहुदानं प्रयच्छतः (देवेषु श्रवः-अक्रतः) इन्द्रियेषु यशः कुरुत ॥७॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - The wise and visionary yajakas with the inspiration of Indra, lord ruler, create knowledge relating to senses, mind and will, and with their senses raised to eighfold power and sensitivity, giving me a thousand gifts, win praise among brilliant scholars.