पदार्थान्वयभाषाः - [१] (वाघतः) = ज्ञान का वहन करनेवाले मेधावी ऋत्विज् (इन्द्रेण युजा) = उस प्रभु रूप मित्र के साथ (गोमन्तम्) = प्रशस्त ज्ञानेन्द्रियों से बने (व्रजम्) = इस इन्द्रियसमूह को तथा (अश्विनम्) = प्रशस्त कर्मेन्द्रियों से बने इस इन्द्रियसमूह को (निःसृजन्त) = विषयपंक से बाहिर निकाल लेते हैं। ये लोग इन्द्रियों को विषयपंक में नहीं फँसने देते। इसके लिये वे प्रभु का स्मरण करते हैं, प्रभु की मित्रता का परिणाम होता है कि वे वासनाओं को जीत लेते हैं और इन्द्रियों को सुरक्षित कर पाते हैं। [२] ये (अष्टकर्ण्यः) = व्याप्त कर्णोंवाले, अर्थात् ज्ञान का खूब श्रवण करनेवाले (सहस्त्रम्) = [स+हस्] प्रसन्नतापूर्वक (मे) = मेरे प्रति अपने को देते हुए अथवा खूब दान करते हुए, (देवेषु) = दिव्यगुणों के विषय में (श्रवः) = अपनी कीर्ति को अक्रत फैलाते हैं। ज्ञान को प्राप्त करते हैं, और त्यागशील बनते हैं । ये दोनों बातें मिलकर उनके अन्दर दिव्यगुणों का वर्धन करनेवाली होती हैं। इन दिव्यगुणों के कारण उनका चारों ओर यश फैलता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु को मित्र बनाकर ज्ञानी पुरुष इन्द्रियों को सुरक्षित करते हैं । ये खूब ज्ञान प्राप्त करते हैं, त्यागशील होते हैं। और इस प्रकार अपने दिव्यगुणों के कारण कीर्तिवाले होते हैं ।