सूभृता वाणी के प्रति अर्पण
Word-Meaning: - [१] गत मन्त्र में 'अश्वः विप्रः च असि' इन शब्दों में कर्मों में व्याप्त होनेवाले को 'अश्व' कहा है और ज्ञान के द्वारा अपनी न्यूनताओं को दूर करनेवाले को 'विप्र'। एक व्यक्ति (यदि) = यदि (युवोः) = ' क्रिया व ज्ञान' इन दोनों को (सख्याय) = मैत्री के लिये होता है तो ये क्रिया व ज्ञान (अस्मे शर्धाय) = हमारे बल के लिये होते हैं । यह पुरुष ही वस्तुतः (स्तोमं जुजुषे) = प्रभु के स्तोत्र का सेवन करता है । (नमस्वान्) = यह प्रभु के प्रति नमस्वाला होता है। इस प्रभु के प्रति नमन के कारण ही इसे उन क्रियाओं व ज्ञानों का गर्व नहीं होता । [२] यह वह व्यक्ति होता है (यस्मिन्) = जिसमें (विश्वत्र) = [सर्वत्र] सब प्रसंगों में (गिरः) = उस प्रभु की वाणियाँ (आः) = समन्तात् (समीची:) = [सं अञ्च्] सम्यक् गतिवाली होती हैं । अर्थात् इसे प्रत्येक धर्म जिज्ञासा के प्रसंग में हृदयस्थ प्रभु की वाणी सुनाई पड़ती है। और यह वाणी ही इस व्यक्ति के लिये (पूर्वी गातुः इव) = पालन व पूरण करनेवाले, उन्नतिपथ पर ले चलनेवाले मार्ग के समान होती है। यह इस वाणी के अनुसार ही जीवन में चलता है और यह इस (सूनृतायै) = [सु ऊन् ऋता] उत्तम दुःखों का परिहाण करनेवाली, सत्य वाणी के लिये (दाशत्) = अपने को दे डालता है। उस वाणी के अनुसार ही कार्यों को करनेवाला होता है ।
Connotation: - भावार्थ - क्रिया व ज्ञान का समन्वय हमारे बल को बढ़ाता है, यही प्रभु का सच्चा उपासन है। इस उपासक को प्रभु की वाणी सुनाई पड़ती है, यह सूनृत वाणी ही उसके जीवन का मार्ग बनती है ।