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यु॒वोर्यदि॑ स॒ख्याया॒स्मे शर्धा॑य॒ स्तोमं॑ जुजु॒षे नम॑स्वान् । वि॒श्वत्र॒ यस्मि॒न्ना गिर॑: समी॒चीः पू॒र्वीव॑ गा॒तुर्दाश॑त्सू॒नृता॑यै ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yuvor yadi sakhyāyāsme śardhāya stomaṁ jujuṣe namasvān | viśvatra yasminn ā giraḥ samīcīḥ pūrvīva gātur dāśat sūnṛtāyai ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यु॒वोः । यदि॑ । स॒ख्याय॑ । अ॒स्मे इति॑ । शर्धा॑य । स्तोम॑म् । जु॒जु॒षे । नम॑स्वान् । वि॒श्वत्र॑ । यस्मि॑न् । आ । गिरः॑ । स॒म्ऽई॒चीः । पू॒र्वीऽइ॑व । गा॒तुः । दाश॑त् । सू॒नृता॑यै ॥ १०.६१.२५

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ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:61» मन्त्र:25 | अष्टक:8» अध्याय:1» वर्ग:30» मन्त्र:5 | मण्डल:10» अनुवाक:5» मन्त्र:25


ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (युवयोः सख्याय) तुम स्त्री-पुरुषों के मित्रभाव के लिए (अस्मे शर्धाय) हमारे आत्मबलप्राप्ति के लिए (नमस्वान् स्तोमम्) स्तुतिमान् होता हुआ स्तुतिसमूह को (यदि जुजुषे) यदि तू सेवन करता है या स्वीकार करता है, तो (यस्मिन् विश्वत्र) जिस तुझ विश्व की रक्षा करनेवाले में (समीचीः-पूर्वीः-इव गिरः) श्रेष्ठ स्तुतियों को (गातुः-दाशत्) तुझ परमात्मा के प्रति गमनशील उपासक देता है-समर्पित करता है (सूनृतायै) शोभन मुमुक्षु भावना के लिए, जिससे वे सफल होवें ॥२५॥
भावार्थभाषाः - उपासक को समस्त स्त्री-पुरुषों के प्रति मित्रभाव रखना चाहिए। इससे परमात्मा स्तुतियों को स्वीकार करता है-अपनाता है तथा उसे मोक्ष प्रदान करता है ॥२५॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

सूभृता वाणी के प्रति अर्पण

पदार्थान्वयभाषाः - [१] गत मन्त्र में 'अश्वः विप्रः च असि' इन शब्दों में कर्मों में व्याप्त होनेवाले को 'अश्व' कहा है और ज्ञान के द्वारा अपनी न्यूनताओं को दूर करनेवाले को 'विप्र'। एक व्यक्ति (यदि) = यदि (युवोः) = ' क्रिया व ज्ञान' इन दोनों को (सख्याय) = मैत्री के लिये होता है तो ये क्रिया व ज्ञान (अस्मे शर्धाय) = हमारे बल के लिये होते हैं । यह पुरुष ही वस्तुतः (स्तोमं जुजुषे) = प्रभु के स्तोत्र का सेवन करता है । (नमस्वान्) = यह प्रभु के प्रति नमस्वाला होता है। इस प्रभु के प्रति नमन के कारण ही इसे उन क्रियाओं व ज्ञानों का गर्व नहीं होता । [२] यह वह व्यक्ति होता है (यस्मिन्) = जिसमें (विश्वत्र) = [सर्वत्र] सब प्रसंगों में (गिरः) = उस प्रभु की वाणियाँ (आः) = समन्तात् (समीची:) = [सं अञ्च्] सम्यक् गतिवाली होती हैं । अर्थात् इसे प्रत्येक धर्म जिज्ञासा के प्रसंग में हृदयस्थ प्रभु की वाणी सुनाई पड़ती है। और यह वाणी ही इस व्यक्ति के लिये (पूर्वी गातुः इव) = पालन व पूरण करनेवाले, उन्नतिपथ पर ले चलनेवाले मार्ग के समान होती है। यह इस वाणी के अनुसार ही जीवन में चलता है और यह इस (सूनृतायै) = [सु ऊन् ऋता] उत्तम दुःखों का परिहाण करनेवाली, सत्य वाणी के लिये (दाशत्) = अपने को दे डालता है। उस वाणी के अनुसार ही कार्यों को करनेवाला होता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - क्रिया व ज्ञान का समन्वय हमारे बल को बढ़ाता है, यही प्रभु का सच्चा उपासन है। इस उपासक को प्रभु की वाणी सुनाई पड़ती है, यह सूनृत वाणी ही उसके जीवन का मार्ग बनती है ।

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (युवयोः सख्याय-अस्मे शर्धाय) युवयोः स्त्रीपुरुषगणयोः सखित्वाय, अस्माकं आत्मबलप्रापणाय “शर्धः-बलनाम” [निघ०] (नमस्वान् स्तोमं यदि जुजुषे) स्तुतिमान् सन् स्तुतिप्राप्तिमान् स्तुतिसमूहे यदि सेवसे स्वीकुर्याः, तदा (यस्मिन् विश्वत्र) विश्वस्य त्रातरि यस्मिन् परमात्मनि ‘विश्वत्र-इत्यत्र ङिप्रत्ययस्य लुक् छान्दसः’ (समीचीः-पूर्वीः-इव गिरः) सम्यक् श्रेष्ठा एव स्तुतीः (गातुः-दाशत्) परमात्मानं प्रति गमनशीलः-उपासको ददाति समर्पयति (सूनृतायै) शोभनमुमुक्षुभावनायै, सा सफला भवेत् ॥२५॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O enlightened men and women of the world, if for your love and friendship and the growth of our strength, the devotee were to offer a song of adoration with homage, humility and love to the lord to whom all earnest voices of prayer converge and reach for fulfilment all over the world, and the lord of all might were pleased to accept, he would bless us with a vision of the path of truth and progress.