Word-Meaning: - [१] (अधा नु) = अब निश्चय से (अस्य जेन्यस्य) = इस विजयशील परमात्मा के (पुष्टौ) = पोषण में, प्रभु को अपने हृदय में धारण करने पर (वृथा) = अनायास ही (रेभन्ते) ये प्रभु-भक्त उसका स्तवन कर उठते हैं । (तद् उ नु) = उस प्रभु की ओर ही निश्चय से (ईमहे) = [ ई = to go ] हम चलते हैं । [२] (सरण्युः) = यह अपनी प्रत्येक क्रिया से प्रभु की ओर चलनेवाला व्यक्ति (अस्य सूनुः) = इस प्रभु का सच्चा पुत्र होता है । (अश्वः) = [अश्रुते कर्मसु ] सदा कर्मों में व्याप्त होनेवाला यह प्रभु-भक्त (विप्रः) = अपना पूरण करनेवाला होता है (च) = और (श्रवसः) = ज्ञान के (सातौ) = सम्भजन व प्राप्ति में असि होता है । इसका पुरुषार्थ ज्ञान वृद्धि के लिये होता है । [३] 'रेभन्ते' शब्द स्तुति का उल्लेख करता है, 'सरण्यु व अश्व' शब्द क्रियाओं में लगे रहने का भाव देते हैं और 'श्रवसः साति' ज्ञान प्राप्ति का संकेत करते हैं । एवं इसके जीवन में 'स्तुति, कर्म व ज्ञान' का सुन्दर समन्वय होता है । इसका हृदय प्रभु का स्तवन करता है, हाथ कर्मों में व्याप्त करते हैं और यह मस्तिष्क को ज्ञान से दीप्त करने का प्रयत्न करता है ।
Connotation: - भावार्थ - हम सब विजयों को प्रभु की ओर से होता हुआ जानें। क्रियाशील व ज्ञानमय जीवनवाले बनें। हम प्रभु के निष्काम आराधक हों ।