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असु॑नीते॒ मनो॑ अ॒स्मासु॑ धारय जी॒वात॑वे॒ सु प्र ति॑रा न॒ आयु॑: । रा॒र॒न्धि न॒: सूर्य॑स्य सं॒दृशि॑ घृ॒तेन॒ त्वं त॒न्वं॑ वर्धयस्व ॥

English Transliteration

asunīte mano asmāsu dhāraya jīvātave su pra tirā na āyuḥ | rārandhi naḥ sūryasya saṁdṛśi ghṛtena tvaṁ tanvaṁ vardhayasva ||

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Pad Path

असु॑ऽनीते । मनः॑ । अ॒स्मासु॑ । धा॒र॒य॒ । जी॒वात॑वे । सु । प्र । ति॒र॒ । नः॒ । आयुः॑ । र॒र॒न्धि । नः॒ । सूर्य॑स्य । स॒म्ऽदृशि॑ । घृ॒तेन॑ । त्वम् । त॒न्व॑म् । व॒र्ध॒य॒स्व॒ ॥ १०.५९.५

Rigveda » Mandal:10» Sukta:59» Mantra:5 | Ashtak:8» Adhyay:1» Varga:22» Mantra:5 | Mandal:10» Anuvak:4» Mantra:5


BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (असुनीते) हे प्राणों को प्रेरणा देनेवाले ईश्वर ! (अस्मासु मनः-धारय) हमारे अन्दर मन-अन्तःकरण को धारण करा-विकसित कर-उन्नत कर (जीवातवे) चिरकाल तक जीने के लिए (नः-आयुः सु प्र तिर) हमारी आयु को सुखरूप में बढ़ा (सूर्यस्य सन्दृशि नः-रारन्धि) सूर्य के दर्शन के लिए हमें समर्थ कर (घृतेन त्वं तन्वं वर्धयस्व) अपने तेज के द्वारा तू आत्मा को संपुष्ट कर ॥५॥
Connotation: - संयम के द्वारा परमात्मा की उपासना प्रार्थना करनेवाले मनुष्य के प्राणों को परमात्मा बढ़ाता है और अन्तःकरण को विकसित करता है, सुखरूप दीर्घजीवन प्रदान करता है। इन्द्रियों में देखने आदि की शक्ति बनाये रखता है तथा आत्मतेज को भी देता है ॥५॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

असु-नीति

Word-Meaning: - [१] हे (असुनीते) = प्राणों के धारण की नीति ! तू (अस्मासु) = हमारे में (मनः) = मन को (धारय) = धारण कर। दीर्घ जीवन के लिये पहला सिद्धान्त यह है कि हम मन को स्थिर करें। भटकता हुआ मन शक्तियों को विकीर्ण कर देता है और इससे कभी दीर्घ जीवन नहीं प्राप्त हो सकता। विशेषकर मन में मृत्यु आदि का भय आ गया और मन को अस्थिर करनेवाला हुआ तब तो दीर्घ जीवन का मतलब ही नहीं रहता। [२] (जीवातवे) = जीवन के लिये (नः आयुः) = हमारी आयु को (सु प्रतिरा) = खूब ही बढ़ा दीजिये। 'आयु' शब्द 'इ गतौ' से बना है। यह गतिशीलता का संकेत करता है । क्रियामय जीवन ही दीर्घजीवन होता है। आलस्य आयुष्य को अल्प कर देता है। [३] (नः) = हमें सूर्यस्य सूर्य के (संदृशि) = संदर्शन में (रारन्धि) = सिद्ध करिये। हम अधिक से अधिक सूर्य के सम्पर्क में रहनेवाले बनें। यह उदय व अस्त होता हुआ सूर्य रोग क्रिमियों का नाशक होता है । [४] हे प्रभो! (त्वम्) = आप (घृतेन) = घृत के द्वारा (तन्वम्) = हमारे शरीर को, शरीर की शक्तियों को (वर्धयस्व) = बढ़ाइये । घृत का प्रयोग दीर्घायुष्य का साधक है। 'घृतं आयुः'घृत को आयु ही कहा गया है। पर इस घृत का प्रयोग 'आज्यं तौलस्य प्राशान' तौलकर ही करना है। मात्रा में प्रयुक्त घृत मलों के क्षरण व जाठराग्नि की दीप्ति का कारण बनता है, परन्तु यही अतिमात्रा होने पर जाठराग्नि की मन्दता व यकृत् विकार का कारण हो जाता है। सो घृत का मात्रा में प्रयोग दीर्घजीवनीय है ।
Connotation: - भावार्थ- दीर्घजीवन के चार साधन हैं— [क] मन की दृढ़ता व स्थिरता, [ख] , [क्रियाशीलताग] सूर्य सम्पर्क, [घ] गोघृत का मात्रा में सेवन ।

BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (असुनीते-अस्मासु मनः-धारय) हे प्राणप्रापक ! ईश्वर ! “असवः प्राणा नीयन्ते येन सोऽसुनीतिस्तत्सम्बुद्धौ, हे असुनीते ईश्वर !” [ऋ० १०।५९।६ भाष्यभूमिका, दयानन्दः] “असुनीतिरसून् नयति” [निरु० १०।३९] अस्मासु मनोऽन्तःकरणं धारय-विकासय (जीवातवे) जीवितुं चिरं जीवितुं (नः-आयुः-सु प्र तिर) अस्माकमायुः सुखरूपं प्रवर्धय (सूर्यस्य सन्दृशि नः-रारन्धि) सूर्यस्य संदर्शनाय “सन्दृशि सन्दर्शनाय” [निरु० १०।३९] साधय समर्थय (घृतेन त्वं तन्वं वर्धयस्व) तेजसा “तेजो वै घृतम्” [मै० १।२।८] आत्मानं त्वं सम्पोषय “आत्मा वै तनूः” [श० ६।७।२।६] ॥५॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - O mother harbinger of pranic energy, bless us with the strength of mind and morale, and for our good living give us good health and long full age. Mature and establish us in the light of the sun and the vision of divinity, and with the lustre and energy of nature raise our health and age to the heights of perfection.