पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (असुनीते) = प्राणों के धारण की नीति ! तू (अस्मासु) = हमारे में (मनः) = मन को (धारय) = धारण कर। दीर्घ जीवन के लिये पहला सिद्धान्त यह है कि हम मन को स्थिर करें। भटकता हुआ मन शक्तियों को विकीर्ण कर देता है और इससे कभी दीर्घ जीवन नहीं प्राप्त हो सकता। विशेषकर मन में मृत्यु आदि का भय आ गया और मन को अस्थिर करनेवाला हुआ तब तो दीर्घ जीवन का मतलब ही नहीं रहता। [२] (जीवातवे) = जीवन के लिये (नः आयुः) = हमारी आयु को (सु प्रतिरा) = खूब ही बढ़ा दीजिये। 'आयु' शब्द 'इ गतौ' से बना है। यह गतिशीलता का संकेत करता है । क्रियामय जीवन ही दीर्घजीवन होता है। आलस्य आयुष्य को अल्प कर देता है। [३] (नः) = हमें सूर्यस्य सूर्य के (संदृशि) = संदर्शन में (रारन्धि) = सिद्ध करिये। हम अधिक से अधिक सूर्य के सम्पर्क में रहनेवाले बनें। यह उदय व अस्त होता हुआ सूर्य रोग क्रिमियों का नाशक होता है । [४] हे प्रभो! (त्वम्) = आप (घृतेन) = घृत के द्वारा (तन्वम्) = हमारे शरीर को, शरीर की शक्तियों को (वर्धयस्व) = बढ़ाइये । घृत का प्रयोग दीर्घायुष्य का साधक है। 'घृतं आयुः'घृत को आयु ही कहा गया है। पर इस घृत का प्रयोग 'आज्यं तौलस्य प्राशान' तौलकर ही करना है। मात्रा में प्रयुक्त घृत मलों के क्षरण व जाठराग्नि की दीप्ति का कारण बनता है, परन्तु यही अतिमात्रा होने पर जाठराग्नि की मन्दता व यकृत् विकार का कारण हो जाता है। सो घृत का मात्रा में प्रयोग दीर्घजीवनीय है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- दीर्घजीवन के चार साधन हैं— [क] मन की दृढ़ता व स्थिरता, [ख] , [क्रियाशीलताग] सूर्य सम्पर्क, [घ] गोघृत का मात्रा में सेवन ।