सूनवः [सच्चे पुत्रों के लक्षण] 'प्राणशक्ति व प्रकाश'
Word-Meaning: - [१] (सूनवः) = प्रभु के सच्चे पुत्र अपने पिता उस प्रभु को (द्विधा) = दो प्रकार से (आस्थापयन्त) = अपने में स्थापित करते हैं, अपने हृदय देश में आसीन करते हैं। एक तो ('असुर') = असुर के रूप में और दूसरा ('स्वर्विदम्') = स्वर्विद् के रूप में। [क] जब हम प्रभु को अपने में आसीन करते हैं तो वे प्रभु 'असून् राति 'हमें प्राणशक्ति प्राप्त कराते हैं, हमारे शरीर रोगों से संघर्ष करने की शक्ति से युक्त होने के कारण नीरोग 'स्वस्थ, सबल व सुन्दर' बने रहते हैं। [ख] शरीरों के स्वास्थ्य के साथ प्रभु हमें मानस व बौद्धिक स्वास्थ्य भी प्राप्त कराते हैं, वे 'स्वर्विद्' हैं, प्रकाश को प्राप्त करानेवाले । इस प्रकाश में चलते हुए हम मार्गभ्रष्ट नहीं होते । एवं प्रभु को दो प्रकार से स्थापन करने के कारण हम शरीर में प्राणशक्ति सम्पन्न बनते हैं और मस्तिष्क में प्रकाशमय । [२] यह प्रभु का दो प्रकार से स्थापन ('तृतीयेन कर्मणा') = तृतीय कर्म से होता है। यह तृतीय कर्म यज्ञरूप मुख्य धर्मों में 'देव - पूजा व संगतिकरण' के बाद 'दान' है। दान से प्रभु की स्थापना हमारे हृदयों में होती है। [३] परमात्मा को अपने में स्थापित करने से यह ('स्वां प्रजां') = अपने विकास को धारण करता है। शरीर में शक्ति सम्पन्न व मस्तिष्क में ज्ञान सम्पन्न बनकर यह अपने सब अंगों को विकसित कर पाता है, इसकी कर्मेन्द्रियाँ व ज्ञानेन्द्रियाँ अपने-अपने कार्य को सुचारुरूपेण करनेवाली होती हैं। इस प्रकार अपना विकास करनेवाले ये लोग पितरः- अपना रक्षण करनेवाले होते हैं ‘पा रक्षणे'। अपने जीवन में न्यूनताओं को नहीं आने देते । प्रभु से अपना सम्बन्ध बनाकर ये ('पित्र्यं सहः') = उस पिता प्रभु से प्राप्त होनेवाले बल को अपने में धारण करते हैं । [४] ये इस बल को (अवरेषु) = अपनी अनन्तर सन्तानों [= पुत्रों] में भी (आदधुः) = स्थापित करनेवाले होते हैं। इस प्रकार अपनी सन्तानों को भी उत्तम बनाते हुए ये (तन्तुम्) = अपने इस प्रजातन्तु को (आततम्) = विस्तृत करते हैं । ये अविच्छिन्न, वंशवाले होते हैं ।
Connotation: - भावार्थ - धन के त्याग से हम प्रभु के समीप होते हैं। प्रभु हमें प्राणशक्ति व प्रकाश देते हैं। हम प्रभु से प्राप्त बल को अपनी सन्तानों में भी स्थापित कर अविच्छिन्न वंशवाले बनते हैं ।