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द्विधा॑ सू॒नवोऽसु॑रं स्व॒र्विद॒मास्था॑पयन्त तृ॒तीये॑न॒ कर्म॑णा । स्वां प्र॒जां पि॒तर॒: पित्र्यं॒ सह॒ आव॑रेष्वदधु॒स्तन्तु॒मात॑तम् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

dvidhā sūnavo suraṁ svarvidam āsthāpayanta tṛtīyena karmaṇā | svām prajām pitaraḥ pitryaṁ saha āvareṣv adadhus tantum ātatam ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

द्विधा॑ । सू॒नवः॑ । असु॑रम् । स्वः॒ऽविद॑म् । आ । अ॒स्था॒प॒य॒न्त॒ । तृ॒तीये॑न । कर्म॑णा । स्वाम् । प्र॒ऽजाम् । पि॒तरः॑ । पित्र्य॑म् । सहः॑ । आ । अव॑रेषु । अ॒द॒धुः॒ । तन्तु॑म् । आऽत॑तम् ॥ १०.५६.६

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ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:56» मन्त्र:6 | अष्टक:8» अध्याय:1» वर्ग:18» मन्त्र:6 | मण्डल:10» अनुवाक:4» मन्त्र:6


ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सूनवः पितरः) सन्तान-उत्पादक पितृभूत प्राप्त गृहस्थ (पित्र्यम्-असुरं सहः स्वर्विदं द्विधा-आ-अस्थापयन्त) पितृगण में होनेवाले-प्राणों में रमण करनेवाले बल वीर्य-पुत्रपुत्रियों की उत्पत्ति में निमित्तभूत, दो प्रकार का गृहस्थसुख प्राप्त करानेवाले को पत्नी में आस्थापित करते हैं (तृतीयेन कर्मणा) प्रथम कर्म योगाभ्यास, दूसरा कर्म है त्याग और तृतीय गृहकर्म-गृहस्थ कर्म है, उस गृहस्थकर्म से ऋतुधर्म से (स्वां प्रजाम्) अपनी सन्तति प्राप्त करने को (अवरेषु-आततं तन्तुम्-आ-अदधुः) आगामी पुत्रों में फैलाये हुए वंशतन्तु को भलीभाँति धारण करते हैं ॥६॥
भावार्थभाषाः - गृहस्थ जन उत्तम सन्तान की उत्पत्ति के लिए संयमपूर्वक सुरक्षित जीवनतत्त्व गर्भाधान द्वारा ऋतु अनुसार योग्य पत्नी में संस्थापित करके संसारिक सुख को प्राप्त करें। पुनः त्यग और योगाभ्यास द्वारा अध्यात्मसुख भी प्राप्त करें ॥६॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

सूनवः [सच्चे पुत्रों के लक्षण] 'प्राणशक्ति व प्रकाश'

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (सूनवः) = प्रभु के सच्चे पुत्र अपने पिता उस प्रभु को (द्विधा) = दो प्रकार से (आस्थापयन्त) = अपने में स्थापित करते हैं, अपने हृदय देश में आसीन करते हैं। एक तो ('असुर') = असुर के रूप में और दूसरा ('स्वर्विदम्') = स्वर्विद् के रूप में। [क] जब हम प्रभु को अपने में आसीन करते हैं तो वे प्रभु 'असून् राति 'हमें प्राणशक्ति प्राप्त कराते हैं, हमारे शरीर रोगों से संघर्ष करने की शक्ति से युक्त होने के कारण नीरोग 'स्वस्थ, सबल व सुन्दर' बने रहते हैं। [ख] शरीरों के स्वास्थ्य के साथ प्रभु हमें मानस व बौद्धिक स्वास्थ्य भी प्राप्त कराते हैं, वे 'स्वर्विद्' हैं, प्रकाश को प्राप्त करानेवाले । इस प्रकाश में चलते हुए हम मार्गभ्रष्ट नहीं होते । एवं प्रभु को दो प्रकार से स्थापन करने के कारण हम शरीर में प्राणशक्ति सम्पन्न बनते हैं और मस्तिष्क में प्रकाशमय । [२] यह प्रभु का दो प्रकार से स्थापन ('तृतीयेन कर्मणा') = तृतीय कर्म से होता है। यह तृतीय कर्म यज्ञरूप मुख्य धर्मों में 'देव - पूजा व संगतिकरण' के बाद 'दान' है। दान से प्रभु की स्थापना हमारे हृदयों में होती है। [३] परमात्मा को अपने में स्थापित करने से यह ('स्वां प्रजां') = अपने विकास को धारण करता है। शरीर में शक्ति सम्पन्न व मस्तिष्क में ज्ञान सम्पन्न बनकर यह अपने सब अंगों को विकसित कर पाता है, इसकी कर्मेन्द्रियाँ व ज्ञानेन्द्रियाँ अपने-अपने कार्य को सुचारुरूपेण करनेवाली होती हैं। इस प्रकार अपना विकास करनेवाले ये लोग पितरः- अपना रक्षण करनेवाले होते हैं ‘पा रक्षणे'। अपने जीवन में न्यूनताओं को नहीं आने देते । प्रभु से अपना सम्बन्ध बनाकर ये ('पित्र्यं सहः') = उस पिता प्रभु से प्राप्त होनेवाले बल को अपने में धारण करते हैं । [४] ये इस बल को (अवरेषु) = अपनी अनन्तर सन्तानों [= पुत्रों] में भी (आदधुः) = स्थापित करनेवाले होते हैं। इस प्रकार अपनी सन्तानों को भी उत्तम बनाते हुए ये (तन्तुम्) = अपने इस प्रजातन्तु को (आततम्) = विस्तृत करते हैं । ये अविच्छिन्न, वंशवाले होते हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - धन के त्याग से हम प्रभु के समीप होते हैं। प्रभु हमें प्राणशक्ति व प्रकाश देते हैं। हम प्रभु से प्राप्त बल को अपनी सन्तानों में भी स्थापित कर अविच्छिन्न वंशवाले बनते हैं ।

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सूनवः-पितरः) प्राणिगर्भसंस्थापकाः “सूनवः प्राणिगर्भ-संस्थापकाः-प्राणिगर्भान् विमोचयन्ति ते” [ऋ० १।३७।१ दयानन्दः] पितृपदप्राप्ता गृहस्थाः [पित्र्यम्-असुरं सहः स्वर्विदं द्विधा-आ-अस्थापयन्त) पितृगणे भवं प्राणेषु रममाणं बलं वीर्यं पुत्रदुहितृजनननिमित्तं द्विप्रकारकं गृहस्थसुखप्रापकं जनन्यामास्थापयन्ति-गर्भाधानं कुर्वन्ति (तृतीयेन कर्मणा) प्रथमं कर्म योगाभ्यासः, द्वितीयं कर्म त्यागः, तृतीयं गृह्यकर्म-गार्हस्थ्यकर्म, ते गार्हस्थ्यकर्मणा-ऋतुधर्मेण (स्वां प्रजाम्) स्वकीयां सन्ततिं प्राप्तुमित्यर्थः (अवरेषु-आततं तन्तुम्-आ-अदधुः) आगामिषु पुत्रेषु आतानितं वंशतन्तुं समन्ताद् धारयन्ति ॥६॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Children of divinity, creative and procreative souls, by their third, familial, karma, vesting the vital and spiritual life principle further along with the procreative vitality, establish their own progeny in the next generation which is the extension of the thread of life in natural piety.