Word-Meaning: - [१] जो व्यक्ति कर्मप्रधान जीवनवाले हैं वे 'पितर' कहलाते हैं, ये रक्षणात्मक कार्यों में व्यापृत रहते हैं । ज्ञानप्रधान जीवनवाले व्यक्ति 'देव' हैं, इनका समय 'अध्ययनाध्यापन' में बीतता है। इनमें (पितरः) = रक्षणात्मक कार्यों में लगे हुए कर्मप्रधान जीवनवाले व्यक्ति (एषाम्) = गत मन्त्र में वर्णित प्रथम धर्मों की (महिम्नः) = महिमा से (चन) = निश्चयपूर्वक (ई शिरे) = ईश बनते हैं, अपने कार्यों के करने में समर्थ होते हैं, इनकी कर्मेन्द्रियाँ सशक्त बनती हैं और 'देव- पूजा, संगतिकरण व दान' रूप कर्मों से पवित्र व सशक्त जीवनवाले होते हुए ये अपने कार्यों को सफलता से करनेवाले होते हैं । [२] (देवाः अपि) = ज्ञानी पुरुष भी एषां (महिम्न:) = इन्हीं 'देव - पूजा, संगतिकरण व दान' रूप धर्मों की महिमा से (देवेषु) = अपनी ज्ञानेन्द्रियों में क्रतुम् प्रज्ञान को (अदधुः) = धारण करते हैं । इनकी ज्ञानेन्द्रियाँ ज्ञान प्राप्ति रूप कर्म में अधिक शक्त बनती हैं। [३] (समविव्यचुः) = ये जो कर्मेन्द्रियाँ इनके जीवन में विस्तृत शक्तिवाली होती हैं [व्यच् विस्तारे] उत और यानि ये जो ज्ञानेन्द्रियाँ (अत्विषुः) = ज्ञान के प्रकाशवाली होती हैं ये (एषां तनूषु) = इन पितरों व देवों के शरीरों में (पुनः) = फिर से (आ) = सर्वथा (निविविशुः) = निश्चित रूप से प्रवेश करती है। विषयों में व्यर्थ न भटकती हुई ये अपने-अपने कार्यों में ठीक से लगी रहती हैं।
Connotation: - भावार्थ- हम देवपूजा आदि धर्मों के पालन से कर्मेन्द्रियों को सशक्त बनाकर रक्षणात्मक कार्यों में लगनेवाले 'पितर' बनें, ज्ञानेन्द्रियों को सशक्त बनाकर ज्ञान ज्योति को फैलानेवाले देव हों।