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म॒हि॒म्न ए॑षां पि॒तर॑श्च॒नेशि॑रे दे॒वा दे॒वेष्व॑दधु॒रपि॒ क्रतु॑म् । सम॑विव्यचुरु॒त यान्यत्वि॑षु॒रैषां॑ त॒नूषु॒ नि वि॑विशु॒: पुन॑: ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

mahimna eṣām pitaraś caneśire devā deveṣv adadhur api kratum | sam avivyacur uta yāny atviṣur aiṣāṁ tanūṣu ni viviśuḥ punaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

म॒हि॒म्नः । ए॒षा॒म् । पि॒तरः॑ । च॒न । ई॒शि॒रे॒ । दे॒वाः । दे॒वेषु । अ॒द॒धुः॒ । अपि॑ । क्रतु॑म् । सम् । अ॒वि॒व्य॒चुः॒ । उ॒त । यानि॑ । अत्वि॑षुः । आ । ए॒षा॒म् । त॒नूषु॑ । नि । वि॒वि॒शुः॒ । पुन॒रिति॑ ॥ १०.५६.४

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ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:56» मन्त्र:4 | अष्टक:8» अध्याय:1» वर्ग:18» मन्त्र:4 | मण्डल:10» अनुवाक:4» मन्त्र:4


ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (देवाः-देवेषु-अपि क्रतुम्-अदधुः) विद्वान् जन अपनी इन्द्रियों में शिवसङ्कल्प-सद्भावना को भरते हैं (एषां महिम्नः पितरः-चन ईशिरे) इसके महत्त्वपूर्ण प्रवचन द्वारा गृहस्थजन भी अपनी इन्द्रियों का स्वामित्व करते हैं। (सम् विव्यथुः) उनका सम्यक् व्यवहार करते हैं (उत) और (यानि-अत्विषुः) जिन स्थानों जन्मस्थानों को प्रकाशित करते हैं (एषां तनूषु) इनके शरीरों में (पुनः-निविविशुः) पुनः निविष्ट होते हैं-पुनः प्रसिद्ध होते हैं ॥४॥
भावार्थभाषाः - विद्वान् जन शिवसंकल्प या सद्भाव के अनुसार अपनी इन्द्रियों को चलाते हैं तथा गृहस्थ जन भी उनके उपदेशानुसार अपनी इन्द्रियों का स्वामित्व करते हैं और उन-उनके अपने स्थानों में अपनी शक्ति द्वारा प्रसिद्ध होते हैं ॥४॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

पितरः देवाः

पदार्थान्वयभाषाः - [१] जो व्यक्ति कर्मप्रधान जीवनवाले हैं वे 'पितर' कहलाते हैं, ये रक्षणात्मक कार्यों में व्यापृत रहते हैं । ज्ञानप्रधान जीवनवाले व्यक्ति 'देव' हैं, इनका समय 'अध्ययनाध्यापन' में बीतता है। इनमें (पितरः) = रक्षणात्मक कार्यों में लगे हुए कर्मप्रधान जीवनवाले व्यक्ति (एषाम्) = गत मन्त्र में वर्णित प्रथम धर्मों की (महिम्नः) = महिमा से (चन) = निश्चयपूर्वक (ई शिरे) = ईश बनते हैं, अपने कार्यों के करने में समर्थ होते हैं, इनकी कर्मेन्द्रियाँ सशक्त बनती हैं और 'देव- पूजा, संगतिकरण व दान' रूप कर्मों से पवित्र व सशक्त जीवनवाले होते हुए ये अपने कार्यों को सफलता से करनेवाले होते हैं । [२] (देवाः अपि) = ज्ञानी पुरुष भी एषां (महिम्न:) = इन्हीं 'देव - पूजा, संगतिकरण व दान' रूप धर्मों की महिमा से (देवेषु) = अपनी ज्ञानेन्द्रियों में क्रतुम् प्रज्ञान को (अदधुः) = धारण करते हैं । इनकी ज्ञानेन्द्रियाँ ज्ञान प्राप्ति रूप कर्म में अधिक शक्त बनती हैं। [३] (समविव्यचुः) = ये जो कर्मेन्द्रियाँ इनके जीवन में विस्तृत शक्तिवाली होती हैं [व्यच् विस्तारे] उत और यानि ये जो ज्ञानेन्द्रियाँ (अत्विषुः) = ज्ञान के प्रकाशवाली होती हैं ये (एषां तनूषु) = इन पितरों व देवों के शरीरों में (पुनः) = फिर से (आ) = सर्वथा (निविविशुः) = निश्चित रूप से प्रवेश करती है। विषयों में व्यर्थ न भटकती हुई ये अपने-अपने कार्यों में ठीक से लगी रहती हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम देवपूजा आदि धर्मों के पालन से कर्मेन्द्रियों को सशक्त बनाकर रक्षणात्मक कार्यों में लगनेवाले 'पितर' बनें, ज्ञानेन्द्रियों को सशक्त बनाकर ज्ञान ज्योति को फैलानेवाले देव हों।

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (देवाः-देवेषु-अपि क्रतुम्-अदधुः) विद्वांसः खलु स्वकीयेन्द्रियेषु स्वसङ्कल्पं धरन्ति स्वशिवसङ्कल्पं भरन्ति (एषां महिम्नः पितरः-चन-ईशिरे) एतेषां महत्त्वपूर्णप्रवचनेन गृहस्थजनाः खल्वपि चेन्द्रियाणां स्वामित्वं कुर्वन्ति (सम् विव्यथुः) तानि सम्यग् व्यवहरन्ति (उत) अपि च (यानि-अत्विषुः) यानि स्थानानि जन्मस्थानानि प्रकाशन्ते (एषां तनूषु) एषां शरीरेषु (पुनः-निविविशुः) पुनर्निविशन्ते पुनर्जायन्ते ॥४॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - The forefathers lived in the grand manner of these divinities such as light of the sun and moon to their own will and desire as if commanding the bliss and beauty of these. Divine were they who raised their acts and worship to the presence and piety of divinities. They join those lights of divinity which shine and then again they come back to join life in their existential bodies.