Word-Meaning: - [१] यह संसार - नदी (अश्मन्वती) = पत्थरोंवाली है, इसमें तैरना सुगम नहीं। विविध प्रलोभन ही इसमें पत्थरों के समान हैं उनसे प्रतिक्षण टकराने का यहाँ भय है । (मह रीयते) = निरन्तर चल रही है। संसार में रुकने का काम नहीं, गति ही संसार है, यह संसार नदी निरन्तर प्रवाह में है । [२] देव लोक परस्पर प्रेरणा देते हुए कहते हैं कि (संरभध्वम्) = परस्पर मिलकर तैयार हो जाओ उत्तिष्ठत-उठ खड़े होवो, (सखायः) = मित्र बनकर, एक दूसरे का हाथ पकड़कर, प्रतरता- इसे तैर जाओ। इस संसार में अकेले में पतन का भय है, एक साथी को चुनकर हम इस नदी में फिसलने से सम्भल जाते हैं। [३] ये (अशेवाः असन्) = जो भी चीज़ें (अशेव) = असुखकर हैं उन्हें हम (अत्रा) = इसी किनारे (जहाम) = छोड़ दें, उनसे बोझल होकर तो हम इस नदी में डूब ही जाएँगे । (वयम्) = हम, इस प्रकार अशेष वस्तुओं के छोड़ने से हलके होकर (शिवान् वाजान् अभि) = कल्याणकर [धनों] की ओर (वाज) = wealth (उत्तरेम) = तैरकर पहुँच जाएँ। यदि इस संसार नदी को हम तैर गये तो फिर कल्याण ही कल्याण है। सारा अशिव इस पार ही है, परले पार तो शिव ही शिव है। नदी में डूबें नहीं । विषयों का बोझ लेकर तो इसे तैरने का सम्भव नहीं ।
Connotation: - भावार्थ—यह संसार- नदी विषयरूप पाषाणों से पूर्ण है, दृढ़ निश्चय करके यदि हम इसे तैर गये तो फिर कल्याण ही कल्याण है ।