वांछित मन्त्र चुनें
651 बार पढ़ा गया

अश्म॑न्वती रीयते॒ सं र॑भध्व॒मुत्ति॑ष्ठत॒ प्र त॑रता सखायः । अत्रा॑ जहाम॒ ये अस॒न्नशे॑वाः शि॒वान्व॒यमुत्त॑रेमा॒भि वाजा॑न् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

aśmanvatī rīyate saṁ rabhadhvam ut tiṣṭhata pra taratā sakhāyaḥ | atrā jahāma ye asann aśevāḥ śivān vayam ut taremābhi vājān ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अश्म॑न्ऽवती । री॒य॒ते॒ । सम् । र॒भ॒ध्व॒म् । उत् । ति॒ष्ठ॒त॒ । प्र । त॒र॒त॒ । स॒खा॒यः॒ । अत्र॑ । ज॒हा॒म॒ । ये । अस॑न् । अशे॑वाः । शि॒वान् । व॒यम् । उत् । त॒रे॒म॒ । अ॒भि । वाजा॑न् ॥ १०.५३.८

651 बार पढ़ा गया
ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:53» मन्त्र:8 | अष्टक:8» अध्याय:1» वर्ग:14» मन्त्र:3 | मण्डल:10» अनुवाक:4» मन्त्र:8


ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सखायः) हे अपने को परमात्मा के सखा माननेवाले मुमुक्षुजनो ! (अश्मन्वती रीयते) विषय पाषाणवाली संसारनदी वेग से गति कर रही है-बह रही है (सं रभध्वम्) संभलो (उत् तिष्ठत) उठो-उद्यम करो (प्रतरत) पार करो (ये-अशेवाः-असन्) जो सुखरहित अकल्याणकर पाप दोष हैं (वयम्-अत्र जहाम) हम यहाँ पर उन्हें छोड़ दें (शिवान् वाजान्-अभि-उत्तरेम) कल्याणकारी अमृतभोगों को लक्षित कर अथवा कल्याणकारी पुण्यरूप नौका आदि के समान तरानेवाले बल प्रयत्नों को प्राप्त करके संसार नदी को तर जाएँ ॥८॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा के साथ मित्रभाव बनानेवाले लोगों को चाहिए कि वे संसारनदी को पार करने के लिए सावधानी के साथ पाप बोझे को त्याग करके शुभकर्मों को करें, जो नौका के समान तरानेवाले हैं ॥८॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

संसार नदी (अश्मन्वती)

पदार्थान्वयभाषाः - [१] यह संसार - नदी (अश्मन्वती) = पत्थरोंवाली है, इसमें तैरना सुगम नहीं। विविध प्रलोभन ही इसमें पत्थरों के समान हैं उनसे प्रतिक्षण टकराने का यहाँ भय है । (मह रीयते) = निरन्तर चल रही है। संसार में रुकने का काम नहीं, गति ही संसार है, यह संसार नदी निरन्तर प्रवाह में है । [२] देव लोक परस्पर प्रेरणा देते हुए कहते हैं कि (संरभध्वम्) = परस्पर मिलकर तैयार हो जाओ उत्तिष्ठत-उठ खड़े होवो, (सखायः) = मित्र बनकर, एक दूसरे का हाथ पकड़कर, प्रतरता- इसे तैर जाओ। इस संसार में अकेले में पतन का भय है, एक साथी को चुनकर हम इस नदी में फिसलने से सम्भल जाते हैं। [३] ये (अशेवाः असन्) = जो भी चीज़ें (अशेव) = असुखकर हैं उन्हें हम (अत्रा) = इसी किनारे (जहाम) = छोड़ दें, उनसे बोझल होकर तो हम इस नदी में डूब ही जाएँगे । (वयम्) = हम, इस प्रकार अशेष वस्तुओं के छोड़ने से हलके होकर (शिवान् वाजान् अभि) = कल्याणकर [धनों] की ओर (वाज) = wealth (उत्तरेम) = तैरकर पहुँच जाएँ। यदि इस संसार नदी को हम तैर गये तो फिर कल्याण ही कल्याण है। सारा अशिव इस पार ही है, परले पार तो शिव ही शिव है। नदी में डूबें नहीं । विषयों का बोझ लेकर तो इसे तैरने का सम्भव नहीं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ—यह संसार- नदी विषयरूप पाषाणों से पूर्ण है, दृढ़ निश्चय करके यदि हम इसे तैर गये तो फिर कल्याण ही कल्याण है ।

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सखायः) हे परमात्मनः सखायमात्मानं मन्यमाना मुमुक्षवो जनाः (अश्मन्वती रीयते) विषयपाषाणवती संसारनदी वेगेन गच्छति “रीयते गतिकर्मा” [निघ० २।१४] (संरभध्वम्) सावधाना भवत (उत्तिष्ठत) उद्यमं कुरुत (प्रतरत) पारं गच्छत (ये-अशेवाः-असन्) येऽसुखाः सुखरहिता अकल्याणकराः पापदोषाः सन्ति (वयम्-अत्र जहाम) वयमत्रावरस्थाने तान् त्यजामः (शिवान् वाजान्-अभि-उत्तरेम) शिवान् कल्याणकरान्-अमृतभोगान्-अभिलक्ष्य “अमृतोऽन्नं वै वाजः” [जै० २।१९३] यद्वा कल्याणकरान् पुण्यरूपान् नौकादिसदृशान् तारकान् बलप्रयत्नान्-अभिप्राप्य संसारनदीमुत्तरेम पारयेम ॥८॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - The rocky river of life flows on in flood. Hold on fast together, friends, rise and swim to the shore, let us jettison all that is inauspicious here. Let us swim and cross over to attain the trophies of victory.