Word-Meaning: - [१] प्रभु देवों से कहते हैं कि (मा) = मुझे (ददर्श) = जो देखता है (स) = वह (कः) = आनन्दमय होता है, वस्तुतः वह (देवः) = प्रकाशमय जीवनवाला, दैवीवृत्ति का पुरुष (कतमः) = अत्यन्त आनन्दमय होता है, (यः) = जो (मे तन्वः) = मेरे इन शरीरों को (बहुधा) = नाना प्रकार से (पर्यपश्यत्) = देखता है। 'पृथिवी, जल, तेज' आदि ये सब पदार्थ ही प्रभु के शरीर हैं, इनमें प्रभु की शक्ति ही कार्य कर रही है । [२] (क्व) = कहाँ, किस पुरुष में (अह) = निश्चय से (मित्रावरुणा) = मित्र और वरुण (क्षियन्ति) = निवास करते हैं । वस्तुतः जिनमें मित्र और वरुण का निवास है, वे ही प्रभु का दर्शन करते हैं। (मित्रावरुण) = प्राणापान हैं । प्राणापान ही साधना अशुद्धिक्षय के द्वारा ज्ञान को दीप्त करती है और हमें आत्मतत्त्व के दर्शन के योग्य बनाती हैं। ये 'मित्रावरुण' स्नेह व निर्दोषता की भी सूचना देते हैं, वही व्यक्ति प्रभु को देखता है जो सब के प्रति स्नेहवाला होता है और द्वेष से ऊपर उठता है। [३] (अग्नेः) = उस प्रकाशमय प्रभु की (विश्वाः समिधः) = सब दीप्तियाँ (देवयानी:) = देवयान की साधनभूत हैं। अर्थात् प्रभु का प्रकाश मनुष्य को देवयान का पथिक बनाता है। मनुष्य के अन्दर दैवी-सम्पत्ति अधिकाधिक बढ़ती है और वह मनुष्य से देव बन जाता है ।
Connotation: - भावार्थ- आत्मदर्शन से जीवन आनन्दमय बनता है। प्राणापान की साधना मनुष्य को आत्मदर्शन के योग्य बनाती है। प्रभु का प्रकाश मनुष्य को देवयान का पथिक बनाता है ।