Word-Meaning: - [१] (एवा) = गत मन्त्र में वर्णित दूध व जल के उत्पादन के द्वारा (इन्द्रः) = वह सर्वशक्तिमान् (मघवा) = ऐश्वर्यशाली (सत्यराधाः) = सदा सत्य को सफल बनानेवाले प्रभु (देवान् नृन्) = देववृत्तिवाले मनुष्यों को (च्यौत्नेन) = शत्रुओं को स्वस्थान से च्युत करनेवाले बल से (प्र विव्ये) = प्रकर्षेण कान्तिमय करते हैं अथवा प्राप्त होते हैं [नी - गति - कान्ति] । प्रभु के बनाये हुए इन दूध व जल के प्रयोग से हमें वह शक्ति प्राप्त होती है जिससे कि हम आन्तर शत्रु कामादि का तो पराजय करते ही हैं, बाह्य शत्रुओं को भी हम जीत पाते हैं । 'दूध व जल' सोम हैं, ये हमें सौम्य स्वभाव का बनाते हैं। हम उत्तेजना से दूर होकर वासना से ऊपर उठते हैं । [२] हे (हरिवः) = दुःखों के हरण करनेवाले ज्ञान से युक्त प्रभो ! (शचीवः) = शक्ति सम्पन्न प्रभो ! (ते) = आपके (त्वा विश्वा) = उन सब कर्मों को तथा (स्वयशः) = आपके यश को (तुरासः) = कर्मों में त्वरा से प्रवृत्त होनेवाले लोग [त्वर संभ्रमे] अथवा काम-क्रोधादि शत्रुओं का संहार करनेवाले लोग [तुर्वी हिंसायाम्] अभिगृणन्ति = दोनों ओर, अर्थात् दिन के प्रारम्भ में भी तथा दिन की समाप्ति पर भी स्तुत करते हैं । आपकी सर्वज्ञता व सर्वशक्तिमत्ता का तो वे गायन करते ही हैं, आपके यशस्वी कार्यों का भी स्तवन करते हुए वे वासनाओं से ऊपर उठते हैं।
Connotation: - भावार्थ - दूध व जल के प्रयोग से हमें वह च्यौल बल प्राप्त होता है जो कि हमें शत्रुओं के संहार के लिये समर्थ करता है । सूक्त के प्रारम्भ में कहा है कि प्रभु उत्कृष्ट वसुओं को प्राप्त कराते हैं, [१] देव प्रभु का धारण करते हैं और इसी से देव बनते हैं, [२] प्रभु हमारे लोभ व काम को नष्ट करते हैं, [३] सन्तोष, शान्ति व प्रेम को देते हैं, [४] हमारी परदोषान्वेषण की वृत्ति को तथा मद-मोह को नष्ट कर देते हैं, [५] प्रभु-भक्त न अन्याय से धन कमाता है और न उसका विलास में व्यय करता है। [६] प्रभु ही सूर्यादि देवों की दीप्ति के स्रोत हैं, [७] प्रभु-भक्त इन्द्रियों को त्वरा से वश करता है, यत्नशील होता है और अतएव सहस्वाला बनता है, [८] प्रभु ही हमें नाड़ीचक्र में रुधिर के ठीक अभिसरण से शरीर व मानस स्वास्थ्य प्राप्त कराते हैं, [९] जीव की उन्नति के लिये प्रभु ने गौवों के ऊधस् में स्पृहणीय दूध को धारण किया है और नदियों में जल को स्थापित किया है, [१०] इनके प्रयोग से हमें वह बल प्राप्त होता है जिससे कि हम अन्तः व बाह्य शत्रुओं को समाप्त कर पाते हैं, [११] इस बल की प्राप्ति के लिये हम इन्द्र का ही स्तवन करें-