सोमासः उक्थिनः [ सौम्य स्तोता ]
Word-Meaning: - [१] (अहम्) = मैं (एतम्) = इस (पशुम्) = प्राणी को, जो प्रारम्भ में पशुओं के समान ही है, इस पशु-तुल्य मनुष्य को (सायकेन) = [षोऽन्तकर्माणि] वासनाओं का अन्त करने के द्वारा (गव्यम्) = उत्तम ज्ञानेन्द्रियोंवाला [गौ:- ज्ञानेन्द्रिय], (अश्वयम्) = उत्तम कर्मेन्द्रियोंवाला, (पुरीषिणम्) = रेतस् के रूप से शरीर में रहनेवाले जलवाला, (हिरण्यम्) = ज्योतिर्मय - ज्ञान की ज्योतिवाला करता हूँ। प्रभु के उपासन से पूर्व पुरुष एक पशु की तरह ही होता है । उपासना उसकी [क] ज्ञानेन्द्रियों को उत्तम बनाती है, [ख] कर्मेन्द्रियों को सशक्त करती है, [ग] उसको शरीर में रेतस् की ऊर्ध्वगति के लिये समर्थ करती है और [घ] उसकी ज्ञान ज्योति को बढ़ाती है। इस प्रकार यह पशु-स्थिति से ऊपर उठकर उत्तम मनुष्य बनता हुआ देव कोटि में प्रवेश करता है। [२] यह देव प्रभु के प्रति अपना अर्पण करता है, इसी से यह 'दाश्वान्' कहलाता है। इस (दाशुषे) = प्रभु के प्रति अपना अर्पण करनेवाले के लिये (पुरु सहस्त्रा) = शरीर का पालन व पूरण करनेवाले [पुरु= पृ] शतशः अवयवों को (निशिशामि) = तीव्र शक्तिवाला करता हूँ । इस प्रभु भक्त के सब अंग अपना-अपना कार्य करने में पूर्ण समर्थ होते हैं, इसका शरीर विकारों से रहित होता है। प्रत्येक अंग सुसंस्कृत होता है। [३] यह सब होना तभी है (यत्) = जब कि (सोमासः) = सोम का शरीर में रक्षण करनेवाले (उक्थिनः) = स्तोत्रों का उच्चारण करनेवाले लोग (मा) = मुझे (अमन्दिषुः) = प्रसन्न करते हैं । वस्तुतः जैसे पुत्र वही है जो अपने सुचरितों से पिता को प्रीणित करे, इसी प्रकार प्रभु का प्रिय वही है जो [क] सोम शक्ति का रक्षण करके सौम्य स्वभाववाला बनता है तथा वाणी से प्रभु के स्तोत्रों का ही उच्चारण करता है । उसकी वाणी व्यर्थ के शब्दों का उच्चारण नहीं करती।
Connotation: - भावार्थ- प्रभु की उपासना हमें पशु से देव बना देती है। इससे हमारा एक-एक अंग निर्विकार हो जाता है ।