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दि॒वस्परि॑ प्रथ॒मं ज॑ज्ञे अ॒ग्निर॒स्मद्द्वि॒तीयं॒ परि॑ जा॒तवे॑दाः । तृ॒तीय॑म॒प्सु नृ॒मणा॒ अज॑स्र॒मिन्धा॑न एनं जरते स्वा॒धीः ॥

English Transliteration

divas pari prathamaṁ jajñe agnir asmad dvitīyam pari jātavedāḥ | tṛtīyam apsu nṛmaṇā ajasram indhāna enaṁ jarate svādhīḥ ||

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Pad Path

दि॒वः । परि॑ । प्र॒थ॒मम् । ज॒ज्ञे॒ । अ॒ग्निः । अ॒स्मत् । द्वि॒तीय॑म् । परि॑ । जा॒तऽवे॑दाः । तृ॒तीय॑म् । अ॒प्ऽसु । नृ॒ऽमनाः॑ । अज॑स्रम् । इन्धा॑नः । ए॒न॒म् । ज॒र॒ते॒ । सु॒ऽआ॒धीः ॥ १०.४५.१

Rigveda » Mandal:10» Sukta:45» Mantra:1 | Ashtak:7» Adhyay:8» Varga:28» Mantra:1 | Mandal:10» Anuvak:4» Mantra:1


BRAHMAMUNI

इस सूक्त में ‘अग्नि’ शब्द से सूर्य, विद्युत्, अग्नि, तीनों गृहीत हैं, उनकी उत्पत्ति, विज्ञान और उपयोग बतलाया है। अन्तिम छः मन्त्रों में परमात्मा लिया है, वह जैसे-जैसे मनुष्यों का कल्याणसाधक है, वह कहा गया है ।

Word-Meaning: - (अग्निः-प्रथमं दिवः-परि जज्ञे) भौतिक अग्नि पदार्थ प्रथम द्युलोक में प्रकट हुआ सूर्यरूप में (जातवेदाः-द्वितीयम्-अस्मत् परि) दूसरा जातवेद नाम से पार्थिव अग्नि हमारी ओर अर्थात् पृथिवी पर प्रकट हुआ (तृतीयम्-अप्सु) तृतीय अग्नि विद्युत् अन्तरिक्ष में उत्पन्न हुआ (नृमणाः) वह यह तीन प्रकार का अग्नि मनुष्यों में मनन करने का बल देनेवाला है-मननशक्तिप्रद है (एनम्-अजस्रम्-इन्धानः स्वाधीः-जरते) इसको निरन्तर प्रज्वलित करता हुआ, होम आदि कार्य में प्रयुक्त करता हुआ, सम्यग्ध्यानी जन परमात्मा की स्तुति करता है, जिसने इस अग्नि को उत्पन्न किया तथा जरावस्था तक इसे काम में लेता है ॥१॥
Connotation: - परमात्मा ने प्रथम द्युलोक में सूर्य अग्नि को उत्पन्न किया, दूसरे पृथिवी पर अग्नि को उत्पन्न किया, तीसरे अन्तरिक्ष में विद्युदग्नि को उत्पन्न किया। इस प्रकार मनुष्य को इन अग्नियों को देखकर परमात्मा का मनन करते हुए, जरापर्यन्त इनसे लाभ लेते हुए परमात्मा की स्तुति करनी चाहिए ॥१॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

तीन अग्नियाँ

Word-Meaning: - [१] (प्रथमम्) = सबसे पहले (दिवः) = मस्तिष्क रूप द्युलोक से (अग्नि:) = ज्ञानाग्नि (परिजज्ञे) = प्रादुर्भूत होती है। यह ज्ञानाग्नि मस्तिष्क को उसी प्रकार उज्ज्वल करती है जैसे कि सूर्य द्युलोक को । इस अग्नि से हमारे जीवन में प्रकाश ही प्रकाश हो जाता है, वहाँ अन्धकार का विनाश होकर, जीवन का मार्ग अत्यन्त स्पष्टतया दिखने लगता है। परिणामतः हम मार्ग से भ्रष्ट नहीं होते और हमारे कर्म बड़े पवित्र होते हैं। ज्ञानाग्नि कर्मों के मल को उसी प्रकार दग्ध कर देती है जैसे कि स्वर्ण के मल को यह भौतिक अग्नि। इस प्रकार ज्ञानाग्नि कर्मों को पवित्र करती है । [२] (द्वितीयम्) = दूसरे स्थान में (अस्मत्) = हमारे हेतु से (जातवेदा:) = [ जाते-जाते विद्यते] प्रत्येक उत्पन्न प्राणी में होनेवाली जाठराग्नि परि [जज्ञे ] उत्पन्न होती है । [३] (तृतीयम्) = तीसरे स्थान में ('नृमणाः') [नृषु मनो यस्य] = मनुष्यों में सत्यचित्तवाली लोकानुग्रह तत्पर 'नृमणा' नामवाली अग्नि है, जो (अप्सु) = हृदयान्तरिक्ष में निवास करती है । स्वाधी: उत्तम बुद्धि व ध्यानवाला ज्ञानी पुरुष (एनम्) = इस तृतीय 'नृमणा' अग्नि को (अजस्त्रम्) = सतत [लगातार] (इन्धान:) = दीप्त करता हुआ और लोकानुग्रह में तत्पर हुआ- हुआ (जरते) = प्रभु का स्तवन करनेवाला होता है। प्रभु का सच्चा स्तवन 'सर्वभूतहितेरत' बनने से ही होता है । इस तृतीय अग्नि को प्रज्वलित करने के लिये पहली दो अग्नियों का प्रज्वलन भी आवश्यक है। बिना ज्ञान के व बिना स्वास्थ्य के लोकहित के करने का सम्भव नहीं ।
Connotation: - भावार्थ- हम मस्तिष्क में ज्ञानाग्नि को दीप्त करें, उदर में जाठराग्नि को और हृदय में लोकहित की भावनारूप अग्नि को । सच्ची प्रभु-भक्ति इसी में हैं ।

BRAHMAMUNI

अस्मिन् सूक्ते ‘अग्नि’शब्देन सूर्यविद्युदग्नयो गृह्यन्ते, तेषामुत्पत्ति-स्थानानि तदुपयोगश्च प्रतिपाद्यते। अन्तिमे मन्त्रषट्के परमात्मा गृह्यते, स च मानवानां कल्याणसाधको यथा यथा  भवतीति तदुपदिश्यते ।

Word-Meaning: - (अग्निः प्रथमं दिवः-परि जज्ञे) अग्नि-नामकः पदार्थः प्रथमं तु दिवि-द्युलोके “पञ्चम्याः परावध्यर्थे” [अष्टा० ८।३।५१] जातः-जायते सूर्यरूपेण (जातवेदाः-द्वितीयम्-अस्मत् परि) स एव जातानि वस्तूनि वेदयन्ते ज्ञायन्ते प्रत्यक्षीक्रियन्ते खलूपयोगे नीयन्ते येन सोऽस्मासु-अस्माकं निमित्तं पृथिव्यां पार्थिवोऽग्निर्द्वितीयं जज्ञे जायते (तृतीयम्-अप्सु) तृतीयं जायतेऽन्तरिक्षे “आपः-अन्तरिक्षनाम” [निघ० १।३] विद्युदाख्यः (नृमणाः) एषः त्रिविधोऽग्निर्येन नृषु मनो मननबलं भवति सोऽस्ति, तम् (एनम्-अजस्रम्-इन्धानः स्वाधीः जरते ) एवं निरन्तरं दीपयमानः प्रज्वलयन् कार्ये खलूपयोजयन् सम्यग्ध्यानी जनः परमात्मानं स्तौति येनोत्पादितोऽग्निरेष जरां जरापर्यन्तजीवनावस्थां प्राप्तोतीति श्लैषिकोऽर्थः “जरते-अर्चतिकर्मा” [निघ० ३।१४] ॥१॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - Agni first manifests as light in the high heavenly region in the form of the sun. Secondly it manifests as Jataveda, vital heat in all earthly forms around us. In the third form it manifests as energy in waters in the middle regions of space as electricity. Agni is the vital energy which enables humanity to live and work. Man as self-intelligent being lights this perpetual Agni and thereby exalts and celebrates the eternal creative spirit of existence.