Word-Meaning: - [१] हे प्रभो! आपकी कृपा से (बर्हिषः) = वासनाशून्य हृदय के (स्तरीमणि) = बिछाने के निमित्त (अद्य) = आज (अद्वेषः) = हमारे किसी प्रकार का द्वेष न हो। हम सब प्रकार के ईर्ष्या, द्वेष, क्रोध आदि से ऊपर उठकर हृदय को निर्मल बना पायें। उस निर्मल हृदयासन पर हम आपको आमन्त्रित करनेवाले बनें। [२] हम (ग्राव्णाम्) = [गृ-गुरूणां ] ज्ञान देनेवाले गुरुओं के योगे-सम्पर्क में (मन्मनः) = ज्ञान की (साधः) = साधना को (ईमहे) = माँगते हैं। ज्ञानी गुरुओं के सम्पर्क में आकर हमारे ज्ञान में निरन्तर वृद्धि हो । [ साधनं साधः ] [३] हे प्रभो ! आप हमें निरन्तर यही तो प्रेरणा दे रहे हैं कि (आदित्यानाम्) = सब ज्ञानों का आदान करनेवाले गुरुओं के (शर्मणि) = [स्थाने सा० shelter ] शरण में (स्था:) = तू स्थित हो और (भुरण्यसि) = ज्ञान से अपने को भरनेवाला बन तथा कर्त्तव्य कर्मों का धारण करनेवाला बन । [४] हम आपकी इस प्रेरणा को सुनते हुए ज्ञानियों से ज्ञान को प्राप्त करने के लिये यत्नशील हों तथा प्रतिदिन समिधानं अग्निम् समिद्ध की जाती हुई अग्नि से (स्वस्ति) = कल्याण की (ईमहे) = याचना करें। यह अग्निहोत्र की अग्नि हमें नीरोग व सुमना बनाये और इस प्रकार हमें ज्ञान प्राप्ति के योग्य करे।
Connotation: - भावार्थ- हम द्वेष से ऊपर उठकर हृदय को निर्मल बनायें। आचार्यों के सम्पर्क में आकर ज्ञान को प्राप्त करें।