Word-Meaning: - [१] प्रभु कहते हैं कि (वः) = हे मनुष्यो ! तुम्हारे में से (देवयुः) = देव के साथ अपने को जोड़ने की कामनावाला व्यक्ति, प्रभु प्राप्ति की प्रबल इच्छावाला व्यक्ति, (पदं अच्छा) = 'पद्यते मुनिभिर्यस्मात् तस्मात् पद उदाहृतः' उस गन्तव्य स्थान, परागति प्रभु का लक्ष्य करके (प्ररिरिचे) = [रेचति = [To give up]] बुराइयों को छोड़ता है, दुरितों को अपने से दूर करता है । दुरितों को दूर करके और भद्रों को अपनाकर ही तो हम उस प्रभु के समीप पहुँचनेवाले होते हैं। [२] (एक:) = यह गतिशील [इ गतौ ] अथवा औरों की पड़ताल न करता हुआ अपने आप (रुद्रेभिः) = प्राणों के साथ (याति) = उस प्रभु को प्राप्त करता है । प्राणसाधना के द्वारा चित्तवृत्ति का निरोध करता हुआ यह प्रभु का दर्शन करनेवाला बनता है और (तुर्वणिः) = शत्रुओं का संहार करनेवाला होता है 'तुर्व् हिंसायाम्' अथवा त्वरा से शत्रुओं का जीतनेवाला होता है [त्वर् वन्] [३] (येषु अमृतेषु) = जिन विषय-वासनाओं के पीछे न मरनेवाले व्यक्तियों में (जरा) = प्रभु का स्तवन (दावने) = सब उत्तम वस्तुओं के देनेवाला होता है। मनुष्य विषयों से आक्रान्त न हो और प्रभु का स्मरण करनेवाला बने तो उसे योगक्षेम की किसी प्रकार से चिन्ता नहीं रहती। सब आवश्यक वस्तुएँ तो उसे प्राप्त हो ही जाती हैं। [४] प्रभु कहते हैं कि (वः) = तुम्हारी (ऊमेभ्यः) = रक्षा करनेवाले इन देवों के लिये, इन देवों की प्राप्ति के लिये (मधु) = सोम को, वीर्यशक्ति को (परि सिञ्चता) = शरीर में चारों ओर सिक्त करने का प्रयत्न करो । इस मधु के शरीर में सुरक्षित होने पर ही जीवन के सारे माधुर्य निर्भर हैं।
Connotation: - भावार्थ - प्रभु प्राप्ति का मार्ग यही है कि हम दुरितों से दूर हों । प्राणसाधना द्वारा कामादि शत्रुओं को वश में करे। प्रभु-स्तवन को अपनाएँ। सोम को शरीर में ही सुरक्षित करें।