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प्र वोऽच्छा॑ रिरिचे देव॒युष्प॒दमेको॑ रु॒द्रेभि॑र्याति तु॒र्वणि॑: । ज॒रा वा॒ येष्व॒मृते॑षु दा॒वने॒ परि॑ व॒ ऊमे॑भ्यः सिञ्चता॒ मधु॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

pra vo cchā ririce devayuṣ padam eko rudrebhir yāti turvaṇiḥ | jarā vā yeṣv amṛteṣu dāvane pari va ūmebhyaḥ siñcatā madhu ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

प्र । वः॒ । अच्छ॑ । रि॒रि॒चे॒ । दे॒व॒ऽयुः । प॒दम् । एकः॑ । रु॒द्रेभिः॑ । या॒ति॒ । तु॒र्वणिः॑ । ज॒रा । वा॒ । येषु॑ । अ॒मृते॑षु । दा॒वने॑ । परि॑ । वः॒ । ऊमे॑भ्यः । सि॒ञ्च॒त॒ । मधु॑ ॥ १०.३२.५

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ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:32» मन्त्र:5 | अष्टक:7» अध्याय:7» वर्ग:29» मन्त्र:5 | मण्डल:10» अनुवाक:3» मन्त्र:5


ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (एकः-देवयुः) विद्वानों का नेता केवल परमात्मा है (वः) हे विद्वानों ! तुम्हारे लिये (पदम्-अच्छ प्र रिरिचे) प्रापणीय सुफल-मोक्ष को सम्यक् नियत करता है (रुद्रेभिः-तुर्वणिः-याति) और जो दुष्टों को रुलानेवाले बलों के साथ शीघ्रकारी प्राप्त होता है (येषु-अमृतेषु जरा दावने परि) और जिन मुमुक्षुओं में परमात्मा की स्तुति सर्वभाव से देने के लिये वर्तमान रहती है (वः-ऊमेभ्यः-मधु सिञ्चत) तुम लोग उन रक्षकों मुमुक्षुओं के लिये मधुर खाने-पीने योग्य वस्तु समर्पित करो ॥५॥
भावार्थभाषाः - मुमुक्षु विद्वान् का इष्ट देव नेता परमात्मा ही है। वह उसके लिये मोक्ष पद प्रदान करता है। मुमुक्षुजनों के लिये मधुर खान-पान की वस्तुएँ समर्पित करना पुण्य कार्य है। दुष्टों को रुलानेवाले उसके बल हैं ॥५॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

दुरित - विरेचन

पदार्थान्वयभाषाः - [१] प्रभु कहते हैं कि (वः) = हे मनुष्यो ! तुम्हारे में से (देवयुः) = देव के साथ अपने को जोड़ने की कामनावाला व्यक्ति, प्रभु प्राप्ति की प्रबल इच्छावाला व्यक्ति, (पदं अच्छा) = 'पद्यते मुनिभिर्यस्मात् तस्मात् पद उदाहृतः' उस गन्तव्य स्थान, परागति प्रभु का लक्ष्य करके (प्ररिरिचे) = [रेचति = [To give up]] बुराइयों को छोड़ता है, दुरितों को अपने से दूर करता है । दुरितों को दूर करके और भद्रों को अपनाकर ही तो हम उस प्रभु के समीप पहुँचनेवाले होते हैं। [२] (एक:) = यह गतिशील [इ गतौ ] अथवा औरों की पड़ताल न करता हुआ अपने आप (रुद्रेभिः) = प्राणों के साथ (याति) = उस प्रभु को प्राप्त करता है । प्राणसाधना के द्वारा चित्तवृत्ति का निरोध करता हुआ यह प्रभु का दर्शन करनेवाला बनता है और (तुर्वणिः) = शत्रुओं का संहार करनेवाला होता है 'तुर्व् हिंसायाम्' अथवा त्वरा से शत्रुओं का जीतनेवाला होता है [त्वर् वन्] [३] (येषु अमृतेषु) = जिन विषय-वासनाओं के पीछे न मरनेवाले व्यक्तियों में (जरा) = प्रभु का स्तवन (दावने) = सब उत्तम वस्तुओं के देनेवाला होता है। मनुष्य विषयों से आक्रान्त न हो और प्रभु का स्मरण करनेवाला बने तो उसे योगक्षेम की किसी प्रकार से चिन्ता नहीं रहती। सब आवश्यक वस्तुएँ तो उसे प्राप्त हो ही जाती हैं। [४] प्रभु कहते हैं कि (वः) = तुम्हारी (ऊमेभ्यः) = रक्षा करनेवाले इन देवों के लिये, इन देवों की प्राप्ति के लिये (मधु) = सोम को, वीर्यशक्ति को (परि सिञ्चता) = शरीर में चारों ओर सिक्त करने का प्रयत्न करो । इस मधु के शरीर में सुरक्षित होने पर ही जीवन के सारे माधुर्य निर्भर हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु प्राप्ति का मार्ग यही है कि हम दुरितों से दूर हों । प्राणसाधना द्वारा कामादि शत्रुओं को वश में करे। प्रभु-स्तवन को अपनाएँ। सोम को शरीर में ही सुरक्षित करें।

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (एकः-देवयुः) देवानां नेता प्रापयिता वा परमात्मा केवलः (वः) युष्मभ्यम् (पदम्-अच्छ प्र रिरिचे) प्रापणीयं सुफलं मोक्षं सम्यक्-नियतं करोति (रुद्रेभिः-तुर्वणिः-याति) यश्च दुष्टानां रोदयितृभिर्बलैः शीघ्रकारी शीघ्रमायाति (येषु-अमृतेषु जरा दावने परि) अथ च येषु मुमुक्षुषु परमात्मनः स्तुतिर्दानाय परितः सर्वतो वर्त्तते (वः-ऊमेभ्यः मधु सिञ्चत) यूयं तेभ्यो रक्षकेभ्यो मधुरं भोज्यं पेयं च समर्पयत ॥५॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O seekers of divinity, there is only one guide and leader for you who creates and provides the ultimate haven for you with the divines. And that is Indra who readily and instantly comes with his powers of justice, reward and punishment. And among the seekers of immortality and freedom, divine worship and adoration alone is the ultimate and unfailing giver. Therefore offer honeyed hospitality and sincere worship for the divinities that provide the means of protection, advancement and immortality.