Word-Meaning: - [१] गत मन्त्र में 'आपः ' शब्द से 'सोम-कणों' का उल्लेख है। ये सोमकण वे हैं (याभिः) = जिनसे (सोमः) = सोमकणों का रक्षण करनेवाला और अतएव सौम्य स्वभाव पुरुष अथवा [स उमा] उमा, अर्थात् ब्रह्मविद्या से युक्त पुरुष (मोदते) = एक पूर्ण स्वास्थ के मौदिक सुख को प्राप्त करता है (च) = और (हर्षते) = अध्यात्म आनन्द का अनुभव करता है, उसी प्रकार अनुभव करता है (न) जैसे कि (मर्यः) = एक मनुष्य (कल्याणीभिः युवतिभिः) = मंगल स्वभाववाली युवतियों से । यदि घर में पत्नी, बहिन, ननद व भतीजी आदि सभी युवतियाँ प्रसन्न स्वभाव की तथा मुस्कराते हुए चेहरेवाली हों तो युवक पुरुष को प्रसन्नता का अनुभव होता है। इसी प्रकार सोम के रक्षण से एक आन्तरिक आनन्द की प्राप्ति होती है। (२) हे (अध्वर्यो) = अपने साथ अहिंसात्मक कर्मों को जोड़नेवाले पुरुष ! तू (ताः अपः) = उन रेत: कणों की (अच्छा) = ओर आनेवाला हो। सदा इन रेतः कणों का रक्षण कर। इस रक्षण के लिये ही (परा-इहि) = सदा विषयों से दूर होने का प्रयत्न कर। मन को विषयों में न लगने देना ही वह उपाय है जो कि मनुष्य को सोम के रक्षण के योग्य बनाता है। (३) यदा जब (आसिञ्चा) = तू इन रेतःकण रूप जलों से शरीर को समन्तात् सींच डालता है तो (ओषधीभिः पुनीतात्) = रोगमात्र की ओषधियों से ही अपने को पवित्र कर लेता है। इन वीर्यकणों में वह शक्ति है जो सब रोगकृमियों का संहार कर देती है, (ओष) = दहन को (धि) = आहित करती है एवं हमारा जीवन नीरोग हो जाता है, न केवल शरीर के दृष्टि से ही हम नीरोग हो जाते हैं, अपितु मानसदृष्टि से भी तभी तो वस्तुतः हमारे जीवन में मोद व हर्ष आ पाते हैं ।
Connotation: - भावार्थ- वीर्यरक्षण से हम शरीर व मन के दृष्टिकोण से स्वस्थ हों और यह स्वास्थ्य हमें मोद व हर्ष का अनुभव कराये ।