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याभि॒: सोमो॒ मोद॑ते॒ हर्ष॑ते च कल्या॒णीभि॑र्युव॒तिभि॒र्न मर्य॑: । ता अ॑ध्वर्यो अ॒पो अच्छा॒ परे॑हि॒ यदा॑सि॒ञ्चा ओष॑धीभिः पुनीतात् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yābhiḥ somo modate harṣate ca kalyāṇībhir yuvatibhir na maryaḥ | tā adhvaryo apo acchā parehi yad āsiñcā oṣadhībhiḥ punītāt ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

याभिः॑ । सोमः॑ । मोद॑ते । हर्ष॑ते । च॒ । क॒ल्या॒णीभिः॑ । यु॒व॒तिऽभिः । न । मर्यः॑ । ताः । अ॒ध्व॒र्यो॒ इति॑ । अ॒पः । अच्छ॑ । परा॑ । इ॒हि॒ । यत् । आ॒ऽसि॒ञ्चाः । ओष॑धीभिः । पु॒नी॒ता॒त् ॥ १०.३०.५

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ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:30» मन्त्र:5 | अष्टक:7» अध्याय:7» वर्ग:24» मन्त्र:5 | मण्डल:10» अनुवाक:3» मन्त्र:5


ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (याभिः-सोमः-मोदते हर्षते च) जिन प्रजाओं के साथ नवीन राजा संसर्ग करता है-मेल करता है और प्रसन्नता को प्राप्त होता है (मर्यः-न युवतिभिः कल्याणीभिः) जैसे मनुष्य मिलने के स्वभाववाली तथा कल्याण साधनेवाली पारिवारिक स्त्रियों के साथ मेल और हर्ष को प्राप्त करता है (अध्वर्यो-ताः-अपः-अच्छ परा इहि) हे राजसूययज्ञ के याजक ! तू उन प्रजाओं को अभिमुख कर-लक्ष्यकर उन्हें प्राप्त हो (ओषधीभिः-आसिञ्चाः पुनीतात्) राजसूययज्ञ में राजा के अभिषिक्त हो जाने पर प्रजाओं को भी अवशिष्ट जल से अभिषिक्त कर अर्थात् प्रजा के प्रतिनिधि अधिकारीजनों को पवित्र कर और सत्यसंकल्प बनाकर अधिकारीपद के लिये प्रतिज्ञा करा ॥५॥
भावार्थभाषाः - राजा को चाहिये कि प्रजाओं के साथ समागम और हर्ष आनन्द को प्राप्त करे। ऋत्विक् जैसे राजा का राज्याभिषेक करे, वैसे प्रजा के प्रतिनिधि प्रमुखजनों को अधिकारपद पर नियुक्त करने ले लिये अभिषिक्त एवं प्रतिज्ञाबद्ध करे ॥५॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

मोद व हर्ष

पदार्थान्वयभाषाः - [१] गत मन्त्र में 'आपः ' शब्द से 'सोम-कणों' का उल्लेख है। ये सोमकण वे हैं (याभिः) = जिनसे (सोमः) = सोमकणों का रक्षण करनेवाला और अतएव सौम्य स्वभाव पुरुष अथवा [स उमा] उमा, अर्थात् ब्रह्मविद्या से युक्त पुरुष (मोदते) = एक पूर्ण स्वास्थ के मौदिक सुख को प्राप्त करता है (च) = और (हर्षते) = अध्यात्म आनन्द का अनुभव करता है, उसी प्रकार अनुभव करता है (न) जैसे कि (मर्यः) = एक मनुष्य (कल्याणीभिः युवतिभिः) = मंगल स्वभाववाली युवतियों से । यदि घर में पत्नी, बहिन, ननद व भतीजी आदि सभी युवतियाँ प्रसन्न स्वभाव की तथा मुस्कराते हुए चेहरेवाली हों तो युवक पुरुष को प्रसन्नता का अनुभव होता है। इसी प्रकार सोम के रक्षण से एक आन्तरिक आनन्द की प्राप्ति होती है। (२) हे (अध्वर्यो) = अपने साथ अहिंसात्मक कर्मों को जोड़नेवाले पुरुष ! तू (ताः अपः) = उन रेत: कणों की (अच्छा) = ओर आनेवाला हो। सदा इन रेतः कणों का रक्षण कर। इस रक्षण के लिये ही (परा-इहि) = सदा विषयों से दूर होने का प्रयत्न कर। मन को विषयों में न लगने देना ही वह उपाय है जो कि मनुष्य को सोम के रक्षण के योग्य बनाता है। (३) यदा जब (आसिञ्चा) = तू इन रेतःकण रूप जलों से शरीर को समन्तात् सींच डालता है तो (ओषधीभिः पुनीतात्) = रोगमात्र की ओषधियों से ही अपने को पवित्र कर लेता है। इन वीर्यकणों में वह शक्ति है जो सब रोगकृमियों का संहार कर देती है, (ओष) = दहन को (धि) = आहित करती है एवं हमारा जीवन नीरोग हो जाता है, न केवल शरीर के दृष्टि से ही हम नीरोग हो जाते हैं, अपितु मानसदृष्टि से भी तभी तो वस्तुतः हमारे जीवन में मोद व हर्ष आ पाते हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- वीर्यरक्षण से हम शरीर व मन के दृष्टिकोण से स्वस्थ हों और यह स्वास्थ्य हमें मोद व हर्ष का अनुभव कराये ।

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (याभिः सोमः मोदते हर्षते च) याभिः प्रजाभिः सह सोमो राजा सङ्गच्छते “मुद संसर्गे” [चुरादि०] णिज्विधेरनित्यत्वात् तदभावः तथा हर्षमाप्नोति च (मर्यः न युवतिभिः कल्याणीभिः) यथा मनुष्यो मिश्रणस्वभाववतीभिः कल्याणसाधिकाभिः पारिवारिकस्त्रीभिः सह सहयोगं हर्षं च प्राप्नोति (अध्वर्योः ताः अपः अच्छ परेहि) हे राजसूययज्ञस्य याजक ऋत्विक् त्वं ताः प्रजाः-अभिमुखीकृत्याभिलक्ष्यप्राप्तो भव (ओषधीभिः-आसिञ्चाः पुनीतात्) राजसूययज्ञेऽभिषिक्ते राज्ञि प्रजा अपि खल्ववशिष्टाभिरद्भिः “आपो वा ओषधयः” [मै० २।५] समन्तात् सिञ्च प्रजात्वेन प्रजाप्रतिनिधिभूतान्-अधिकारिणो जनान्-एवं पवित्रीकुरु सत्यसङ्कल्पमयान् कुरु-अधिकारिपदे स्थापनाय प्रतिज्ञां कारयित्वा ॥५॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - The liquids with which Soma, the ruling spirit, rejoices and feels exhilarated as men feel happy and exhilarated by noble youthful women, those exciting liquid energies, O high priest of yajna, find from far and near, and when you find them, then cleanse and strengthen the drinks and sanatives for health and joy.