Word-Meaning: - [१] हे (आपः) = रेतः रूप में शरीरस्थ जलो ! (नः) = हमारे जीवन में (अध्वरम्) = हिंसारहित यज्ञादि कर्मों को (हिनोता) = प्रेरित करिये।( देवयज्या) = देवों के संगतिकरण, विद्वानों के मेल को हिनोत प्राप्त कराइये। देवों के सम्पर्क में आकर के ही हम तेजस्वी बनेंगे, इनके संग में रहते हुए हम हिंसादि अशुभ कर्मों में प्रवृत्त न होंगे। [२] (ब्रह्म) = ज्ञान को या स्तुति को हमारे में प्रेरित करिये । वीर्यरक्षण से हमारी ज्ञानाग्नि दीप्त हो और हमारा मन प्रभु-स्तुति के प्रति झुकाववाला हो । [३] हे रेतः कणो ! आप (धानानां सनये) = धनों की प्राप्ति के लिये हमें प्रेरित करिये, अर्थात् आपके रक्षण से हमारे जीवनों को धन्य बनानेवाले धनों को हम प्राप्त करनेवाले बनें । वीर्यरक्षण के अभाव में ही मनुष्य अन्याय मार्ग से धन कमाने लगता है। [४] (ऋतस्य योगे) = हमारे जीवनों में ऋत का योग होने पर, अर्थात् जब हम धनादि के कमाने के लिये कभी अनृत का प्रयोग न करें तो आप (ऊधः) = वेदवाणी रूप गौ के ऊधस् को, ज्ञानकोश को (विष्यध्वम्) = वियुक्त करो, खोलनेवाले बनो। हमारे लिये यह वेदवाणीरूप गौ खूब ही ज्ञानदुग्ध को देनेवाली हो । [५] हे (आपः) = रेतःकणो ! इस प्रकार आप (अस्मभ्यम्) = हमारे लिये (श्रुष्टीवरी:) = [सुखवत्यः सा०] सुख को देनेवाले (भूतन) = होइये। रेतःकणों के रक्षण से हमारा जीवन सुख ही सुखवाला हो ।
Connotation: - भावार्थ - रेतः कणों का रक्षण हमें 'अध्वर, देवयज्या, ब्रह्म, धन प्राप्ति, ऋत, ज्ञान व सुख' की ओर ले चलता है ।